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यह तो जातिवाद का विरोध नहीं, हिमायत है!* *(आलेख : राजेंद्र शर्मा)

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रायपुर:‘‘मेरे लिए देश की चार सबसे बड़ी जातियां हैं। मेरे लिए सबसे बड़ी जाति गरीब हैं। मेरे लिए सबसे बड़ी जाति हैं युवा, मेरे लिए सबसे बड़ी जाति हैं महिलाएं। मेरे लिए सबसे बड़ी जाति हैं किसान।’’ और ‘‘इन चार जातियों का उत्थान ही भारत को विकसित बनाएगा। अगर चार का हो जाएगा, तो इसका मतलब सब का हो जाएगा।’’

प्रधानमंत्री मोदी ने हाल के विधानसभाई चुनावों के नतीजे आने से ऐन पहले, विकसित भारत संकल्प यात्रा के सिलसिले में ‘‘लाभार्थियों’’ से अपने बहुप्रचारित संवाद के क्रम में, जातियों की अपनी यह नयी परिभाषा और पहचान पेश की थी। कहने की जरूरत नहीं है कि जब प्रधानमंत्री बार-बार ‘‘सबसे बड़ी जाति’’, ‘‘सबसे बड़ी जाति’’ कहते हैं, तो वह एक प्रकार से यही दावा कर रहे होते हैं कि उनकी नजर में अगर कोई वास्तविक जातियां हैं, तो यही चार हैं और बाकी जिन्हें जातियों के रूप में सब अब तक मानते आए हैं, वे अगर मिथ्या नहीं भी हों, तो भी, इस ‘‘बड़ी’’ सचाई के सामने, कमतर सचाइयां जरूर हैं। इस तरह, नयी जातियां गढ़कर, जातियों की पारंपरिक पहचान के सामने खड़ी करने और इसके जरिए, जाति व्यवस्था की सचाई को ही नकारने की यह कसरत, प्रधानमंत्री ने उसके बाद से इस तरह बार-बार दोहराई है कि इसके वास्तविक अर्थ पर गौर करना जरूरी हो जाता है।

वास्तव में इस सिलसिले की शुरूआत तो हाल के विधानसभाई चुनावों के और खासतौर पर तीन हिंदीभाषी राज्यों में चुनाव के प्रचार के दौरान ही हो गयी थी। जब इन हिंदीभाषी राज्यों में भाजपा की मुख्य राजनीतिक/ चुनावी प्रतिद्वंद्वी की हैसियत से कांग्रेस ने जाति गणना का मुद्दा प्रमुखता से उठाना शुरू किया और उसकी सरकारों ने अपने-अपने राज्यों में जाति-आधारित गणना कराने का एलान कर दिया और आम तौर पर इस पार्टी ने जाति गणना कराने का जोर-शोर से वादा करना शुरू कर दिया और बिहार में जाति सर्वे के नाम से जाति गणना के आंकड़े प्रकाशित किए जाने के साथ, जाति गणना का प्रश्न चुनावी रूप से भी महत्वपूर्ण हो जाने के आसार दिखाई देने लगे, इस मुद्दे के संभावित प्रभाव की काट करने के लिए प्रधानमंत्री ने, ‘असली जाति’बनाम ‘झूठी जाति’ की उक्त जुम्लेबाजी की शुरूआत की थी। यह दूसरी बात है कि इसके साथ ही घनघोर बौद्धिक मौकापरस्ती का परिचय देते हुए प्रधानमंत्री, इसकी दुहाई देने का भी कोई मौका नहीं छोड़ रहे थे कि वह चूंकि एक ‘‘गरीब ओबीसी’’ हैं, इसीलिए विपक्ष के हमलों के निशाने पर हैं! इसके साथ ही साथ, प्रधानमंत्री जाति गणना की मांग को बांटने वाली और वास्तव में इशारों में बहुसंख्यक हिंदुओं को बांटने वाली गणना बताने में भी लगे हुए थेे।

यह दूसरी बात है कि इसके बावजूद, जाति गणना के सीधे विरोध में आने से बचते हुए, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह समेत भाजपा नेतागण, यह मनवाने में भी लगे हुए थे कि वे जाति गणना के खिलाफ नहीं थे, जिसका सबूत यह था कि जब नीतीश कुमार ने बिहार में जाति सर्वे कराने का निर्णय लिया था, गठबंधन में उनकी सहयोगी की हैसियत से, भाजपा की भी सहमति से ही उक्त निर्णय लिया गया था। यह दिखावा इसके बावजूद किया जा रहा था कि आम तौर पर जाति गणना का विरोध करने के अलावा, मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर, शुरू में बिहार के जाति सर्वे को अवैध बताने की कोशिश की थी, हालांकि बाद में इसके संभावित राजनीतिक/ चुनावी परिणामों को भांपकर, केंद्र सरकार के हलफनामे के उक्त पैरा को ‘‘गलती’’ कहकर वापस ले लिया गया था।

बहरहाल, हाल के विधानसभाई चुनावों के नतीजे आने और खासतौर पर हिंदी पट्टी के तीन महत्वपूर्ण राज्यों –मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान– में भाजपा की प्रभावशाली जीत के बाद से, जाति-जनगणना के मुद्दे पर संघ-भाजपा खुले विरोध के अपने मूल रुख पर लौट आए लगते हैं। इस चुनाव के समय, जब संघ-भाजपा इस मुद्दे पर एक हद तक अपना बचाव ही करते नजर आते थे, कई टिप्पणीकारों का यह कहना था कि इन चुनावों में भाजपा को अगर धक्का लगता है या जाति गणना की मांग असरदार साबित होती है, तो आम चुनाव से पहले ही भाजपा खुद जाति गणना की पैरोकार बन जाएगी। लेकिन, चूंकि इस चुनाव में जाति गणना की मांग खास असरदार साबित नहीं हुई है, संघ-भाजपा इस गणना के खुले विरोध के अपने मूल रुख पर लौट गए लगते हैं। प्रधानमंत्री की असली जाति बनाम झूठी जाति की जुमलेबाजी इसी का इशारा करती है।

यह किसी से छुपा हुुआ नहीं है कि जाति गणना के मुद्दे पर संघ-भाजपा का और इसलिए मोदी सरकार का भी रुख, शुरू से ही विरोध का रहा था। यह रुख तब खुलकर सामने आ गया, जब पिछली यूपीए सरकार के आखिरी वर्षों में करायी गयी सामाजिक-आर्थिक दर्जे की गणना के आंकड़ों का नीति-निर्धारण के लिए उपयोग करना तो दूर, मोदी सरकार ने इन आंकड़ों को ही ‘‘गैर-भरोसेमंद’’ कहकर, सीधे-सीधे खारिज कर दिया। उल्टे मोदी के पहले कार्यकाल के शुरूआती सालों में ही आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने, संघ परिवार के मूल मनुवादी तथा इसलिए आरक्षणविरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए, आरक्षण की व्यवस्था के जारी रहने के औचित्य पर ही सवाल उठाते हुए, इसकी ‘‘समीक्षा’’ का समय आ जाने का एलान कर दिया था।

लेकिन, उसके कुछ ही बाद हुए बिहार के विधानसभाई चुनाव में, भागवत के उक्त एलान के नुकसान को कम करने के लिए उन्हें जितनी तथा जैसी सफाइयां देनी पड़ी थीं, उससे संघ-भाजपा ने यह समझ लिया था, सीधे आरक्षण की व्यवस्था का विरोध करना राजनीतिक रूप से असह्य रूप से महंगा पड़ सकता है। उसके बाद से उन्होंने सीधे आरक्षण की व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाना या उस पर सवाल उठाना तो बंद कर दिया है, लेकिन कथित ऊंची जाति के गरीबों के ‘सुदामा आरक्षण’ जैसी व्यवस्थाओं को आगे बढ़ाने के जरिए परोक्ष रूप से, ऐतिहासिक सामाजिक दमन की सचाई और उसके शमन के साधन के रूप में आरक्षण की व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिशें फिर भी जारी रही हैं। जानी-पहचानी जाति विभाजन की सचाई के सामने, गरीबों या महिलाओं या युवाओं या किसानों की वंचितता को खड़ा करने की प्रधानमंत्री की जुमलेबाजी, उक्त कोशिशों की ही निरंतरता में है।

यह बात याद रखने वाली है कि प्रधानमंत्री जब जाति की जानी-पहचानी सचाई के सामने, ‘‘बड़ी’’ या ‘‘ऊंची’’ सचाई के रूप में किसानों या गरीबों या महिलाओं या युवाओं की चिंता को रखने की लफ्फाजी करते हैं, तो वह किसानों, गरीबों आदि की चिंताओं को रेखांकित करने की नहीं, बल्कि जाति व्यवस्था की सब की जानी-पहचानी सचाई को ही नकारने की कोशिश कर रहे होते हैं। यह संघ-भाजपा के बुनियादी विचारधारात्मक रुख के ही अनुरूप है, जो मनुवाद पर या ब्राह्मणवाद पर आधारित है और इसलिए, भारतीय समाज में जाति व्यवस्था की सचाई को ही नकारने की कोशिश करता है; सीधे-सीधे इसका औचित्य सिद्ध करना मुश्किल जो है।

सभी जानते हैं कि जाति व्यवस्था का सार, ऊंच-नीच पर आधारित सामाजिक स्तर विभाजन में है। लेकिन, संस्कृति या परंपरा या धर्म के नाम पर, इसका औचित्य सिद्ध करना संभव नहीं हो और इस सचाई को नकारना भी संभव न हो, तो जाति व्यवस्था को ही जातिगत पहचानों के ऐसे गट्ठर में तब्दील करने की कोशिश की जाती है, जिसमें साथ रखी गयी जाति इकाइयां आपस में ऊंच-नीच के किसी दमनकारी रिश्ते में बंधी ही नहीं होती हैं।

संघ-भाजपा ने, एक ओर एक दमनकारी व्यवस्था के रूप में जाति व्यवस्था की सचाई को नकारते हुए भी, इस दमनकारी रिश्ते से काटकर, जातिगत पहचानों को ही अपने साथ गोलबंद करने में खासी महारत हासिल कर ली है। जातिगत पहचानों के साथ इस तरह का रिश्ता, एक ओर अलग-अलग जाति-आधारित समूहों का समर्थन हासिल करना संभव बनाता है और दूसरी ओर, वंचित जाति समूहों के भी जाति-व्यवस्था के विरुद्घ आवेग को वैचारिक रूप से बधिया करने का काम करता है। यह जातिवाद का विरोध या उस पर हमला नहीं, जाति व्यवस्था का बचाव, उसकी हिमायत ही है। नरेंद्र मोदी की नयी ‘‘सबसे बड़ी’’ जातियों की खोज, कथित नयी बड़ी जातियों को तो कुछ नहीं देगी, जाति व्यवस्था विरोधी आवेगों से, जिनमें जाति गणना, आनुपातिक आरक्षण की मांग आदि शामिल हैं, इस व्यवस्था को बचाने का ही काम करेगी।

*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)*

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