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बाहर वालों की ताका-झांकी मुर्दाबाद!* *(व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा)

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रायपुर:देखा, देखा, आ गई न यूरोप वालों की हकीकत सामने। ऊपर-ऊपर से बड़े सभ्य, सुसंस्कृत, डैमोक्रेट वगैरह होने का दिखावा करते हैं। बाकी सारी दुनिया को सभ्यता सिखाने का, सभ्य बनाने का गुमान रखते हैं, पर भीतर से बिल्कुल वही के वही हैं, एकदम मामूली, बल्कि उससे भी घटिया। वर्ना दूसरों के घरों में बेबात में ताका-झांकी करना, किस तरह की सभ्यता की निशानी है? पर ये हैं कि दूसरों के घरों में ताका-झांकी तो कर ही रहे हैं, ताका-झांकी भी कोई छुप-छुपाकर नहीं, दीदा-दिलेरी से कर रहे हैं। दूसरों के घरों में ताका-झांकी करते पकड़े जाने पर शर्मिंदा होना पड़ेगा, इसके किसी डर-वर की बात परे छोड़िए, पट्ठे छाती ठोक कर जिनका घर है, उनसे ही जवाब मांग रहे हैं कि ये क्यों किया? वो क्यों कर रहे थे? तुम्हारे यहां मणिपुर क्यों जल रहा है? मणिपुर में शांति कब आएगी? अल्पसंख्यकों के साथ बराबरी का सलूक क्यों नहीं हो रहा है? सत्ता में बैठे लोग खुद क्यों हालात बिगाड़ रहे हैं? और भी न जाने क्या-क्या!

हद तो यह है कि पट्ठों ने दूसरों के घर में ताका-झांकी की अपनी कुटेब पर रंग-रोगन करने के लिए, बाकायदा एक यूरोपीय संसद बना रखी है। डेमोक्रेसी का धोखा खड़ा करने के लिए बाकायदा उसके चुनाव वगैरह भी कराते हैं। उसी संसद ने बाकायदा एक प्रस्ताव भी पास कर दिया है कि मणिपुर में जो चल रहा है, उसे और चलने नहीं दे सकते! बस एक ही कसर रह गई कि उन्होंने मोदी जी को मणिपुर के संबंध में मुंह खोलने का ऑर्डर नहीं दिया। वर्ना यूरोप वाले अपने अहंकार में इतने अंधे हैं कि उनके लिए यह कहना भी नामुमकिन नहीं था कि मणिपुर को जलते दो महीने तो हो गए, पर मोदी जी ने एक शब्द तक नहीं बोला।

खैर! मोदी जी के विदेश विभाग ने भी यूरोपीय संसद को बाकायदा मुंहतोड़ जवाब दिया है। यूरोपीय संसद के मणिपुर के मसले पर मुंह खोलने और मणिपुर का ‘म’ बोल पाने से भी पहले ही, विदेश विभाग ने साफ कर दिया कि जिस मणिपुर की ओर इशारा हो रहा है, वह नये इंडिया का हिस्सा है। और पुराने वाले भारत में जो हुआ हो, सो हुआ हो, पर नये इंडिया के मणिपुर में जो कुछ भी हो रहा है या नहीं हो रहा है, जो कुछ होगा या नहीं होगा, पूरी तरह से भारत का अंदरूनी मामला है। अंदरूनी मामला यानी सचमुच हमारा आपस का मामला। प्यार से रहें तो, लड़ते रहें तो। मिलकर रहें तो, एक-दूसरे के सिर फोड़ते रहें तो। दबे हुए को और दबाते रहें तो, दबाने वाले के पांव दबवाते रहें तो। खुश रहें तो, दु:खी रहें तो। हम चाहे जिस हाल में भी रहें, हमारा अंदरूनी मामला है। और चूंकि हमारा अंदरूनी मामला है, तो जो भी करना होगा या नहीं भी करना होगा, हम ही करेंगे। रघुवीर सहाय से माफी चाहते हैं — हमने बहुत किया है, हमें बहुत करना है। जो करेंगे, हम ही करेंगे। और जो कोई कहेगा कुछ करने को, वो तो हम बिल्कुल नहीं करेंगे! पर कोई हमारे अंदरूनी मामले में टांग क्यों अड़ाए? राष्ट्र की इतनी ऊंची दीवार हमने किसलिए खड़ी की है, कोई मियां-बीवी अपने घर में किस हाल में रहते हैं, इसमें ताक-झांक करने को यूरोपीय यूनियन या कोई और, क्यों आए!

पर ताक-झांक करने के लिए शर्मिंदा करने से यूरोप वाले कहां रुकने वाले हैं। ये तो वो हैं, जो कभी सभ्य बनाने के नाम पर, दुनिया भर में पूरे के पूरे देशों पर कब्जे करते फिरे थे। सो मोदी जी के विदेश विभाग ने “हमारे अंदरूनी मामलों से दूर ही रहो” की चेतावनी देने के बाद, गोरों को अब भी औपनिवेशिक मानसिकता से ही दुनिया को देख रहे होने की भारी-सी गाली भी दे दी। जो चेतावनी से नहीं रुके, वह तो गालियां खाने के ही मांजने का हुआ! पर मोदी राज की गालियां भी खाली गालियां नहीं हैं, उनमें भी गहरा दर्शन है। बताइए, यूरोप वाले होते कौन हैं, मोदी जी के डबल इंजन राज को यह बताने वाले कि गिरजे वगैरह जलवाना सही नहीं है, कि बहुसंख्यकवादी राजनीति सही नहीं है, कि शासन में बैठे लोगों का झगड़ों में खुद एक पक्ष बन जाना सही नहीं है, राजनीतिक विरोधियों को शासन की ताकत से दबाना सही नहीं है, वगैरह! वह जो गलत कहेंगे, वह गलत और जो सही कहेंगे उसे सही, हम क्यों मान लेेंगे? मदर ऑफ डेमोक्रेसी कहलाएं हम और क्या सही, क्या गलत, ये बताएं यूरोप वाले! मोदी जी का नया इंडिया इसे हर्गिज मंजूर नहीं करेगा। और कम से कम ‘मदर’ को यह सिखाने की कोशिश कोई नहीं करे कि क्या डेमोक्रेसी के लक्षण हैं, क्या नहीं हैं! डेमोक्रेसी वगैरह के लक्षण अब से हम ही तय करेंगे। और यूरोप वालों ने ज़्यादा चूं-चपड़ की तो अपने वाले डेमोक्रेसी के फ़ादर जी, डेमोक्रेसी का नाम भी बदलकर, चक्रवर्ती टाइप कुछ प्राचीन वाला नाम रख देंगे।

वैसे ये दूसरों के घर में ताक-झांक करने की बीमारी सिर्फ यूरोप वालों तक ही नहीं है। मणिपुर के ही मामले में, इससे पहले अमरीका के राजदूत ने चिंता-विंता ही नहीं जतायी थी, मांगी जाए तो मदद करने के लिए तैयार होने की भी बात कही थी। लगता है कि ये सारे गोरों की ही प्राब्लम है। देखा नहीं कैसे अमरीका वालों ने व्हाइट हाउस में खुद मोदी जी पर, एक पत्रकार से उनके बहुसंख्यकवादी राज पर एकदम सीधा सवाल दगवा दिया था। वह तो मोदी जी मदर ऑफ डेमोक्रेसी का नाम जपकर बच निकले, पर दामन पर यहां-वहां छींटे तो पड़ ही गए। हम तो कहेंगे कि मोदी ब्रांड नये इंडिया के खिलाफ, डेमोक्रेसी के नाम पर बाकायदा षडयंत्र हो रहा है। कोशिश हो रही है कि नया इंडिया भी, पुराने भारत वाले सेकुलरिज्म, डेमोक्रेसी, सोशलिज्म वगैरह के चक्करों में ही फंसा रहे और अडानी के ज़रिए नये इंडिया का दुनिया में सबसे अमीर बनने का सपना, हाथ में आकर भी यूं ही फिसलता रहे। पर मोदी जी इस षडयंत्र को कामयाब हर्गिज नहीं होने देंगे।

उल्टे मोदी जी इन गोरों को ही खरीद-फरोख्त-प्रधान डेमोक्रेसी का नया पाठ पढ़ा देंगे। देखा नहीं, कैसे यूरोप में भी और किसी ने नहीं, खुद फ्रांस वालों ने मोदी जी को, बास्तील दिवस पर चीफ गैस्ट बनाकर बुलाया है। 1789 में पेरिस की कुख्यात बास्तील जेल के बंदियों को हमला कर के छुड़वाए जाने के साथ, वह फ्रांसीसी क्रांति शुरू हुई थी, जिसके झंडे पर स्वतंत्रता, समता और भाईचारा अंकित था। भाईचारा और मोदी राज, आयोजन में एक साथ — पहले अमरीका, फिर यूरोप, गोरे मोदी जी की नयी डेमोक्रेसी का पाठ भी खूब सीख रहे हैं। बस पुराना वाला अभी पूरा भूलना बाकी है, तभी तो यूरोपीय संसद का प्रस्ताव है; तभी तो फ्रांस में अब भी रफाल सौदे में घोटाले की जांच जारी है।

*(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)*

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