
रायपुर : आई डी बी आई बैंक को कनाडा के फेयरफेक्स ग्रुप को बेचे जाने के खिलाफ उस बैंक की यूनियनों द्वारा 2 व 3 नवंबर को जारी 2 दिवसीय भूख हड़ताल का समर्थन करते हुए आज देश भर में बीमा कर्मियों ने भोजनावकाश के दौरान द्वार प्रदर्शन किया एवं विरोध सभाएं आयोजित की l इसका आव्हान ऑल इंडिया इंश्योरेंस एम्प्लॉइज़ एसोसिएशन द्वारा एकजुटता के स्वरूप में किया गया था l रायपुर में एल आई सी के मंडल कार्यालय मे सम्पन्न एकजुटता कार्यवाही को संबोधित करते हुए ए आई आई ई ए के अध्यक्ष का. धर्मराज महापात्र ने केंद्र सरकार द्धारा की जा रही इस संदिग्ध बिक्री पर सवाल उठाते हुए कहा कि मुनाफे में आ चुकी बैंक को विदेशी कंपनी को बेचने की मंजूरी देश की वित्तीय आत्मनिर्भरता के लिए घातक हैIआर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने 14 अक्टूबर की बैठक में इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया की रणनीतिक बिक्री को मंजूरी दे दी है।यह सौदा चालू वित्त वर्ष के समाप्त होने से पहले पूरा होने की उम्मीद की जा रही है l इस देश विरोधी निर्णय का देश भर में पुरजोर विरोध जारी है l इस प्रमुख बैंक को कनाडा की फेयरफेक्स फाइनेंशियल होल्डिंग कम्पनी को ₹52,878 करोड़ में बेचा जा रहा है, जिसके अंतर्गत 60.72% नियंत्रक हिस्सेदारी का हस्तांतरण होगा। इसमें सरकार अपनी 30.48 फीसद हिस्सेदारी और एल आई सी अपनी 30.24 फीसद हिस्सेदारी बेच रही है। का. महापात्र ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वित्तीय क्षेत्र के कर्मचारियों और भारतीय समाज के प्रगतिशील वर्गों के व्यापक विरोध के बावजूद सरकार इस सौदे के साथ आगे बढ़ रही है l यह विदेशी पूँजी को भारतीय वित्तीय क्षेत्र और देश की घरेलू बचत पर नियंत्रण स्थापित करने देने की दिशा में एक और कदम है। दीर्घकाल में यह देश की राजनीतिक और आर्थिक संप्रभुता के लिए अत्यंत हानिकारक होगा। ए आई आई ई ए इस प्रमुख वित्तीय संस्थान के निजीकरण और विदेशीकरण का विरोध कर रही है। हमे आई डी बी आई में एल आई सी के निवेश को लेकर भी चिंता है। एल आई सी को भी यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह इस बैंक में अपनी हिस्सेदारी क्यों बेच रही है। क्योंकि इस बैंक में निवेश की गई राशि पॉलिसीधारकों की ही थी। अत: एल आई सी के निवेश लक्ष्यों और पॉलिसीधारकों के हितों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी l
यह प्रकरण इस बात का एक स्पष्ट उदाहरण है कि वर्ष 1991 से नवउदारवादी नीतियों को पूरी तरह अपनाने के बाद वित्तीय क्षेत्र में सुधारों के नाम पर संस्थानों को किस प्रकार कमजोर किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि आई डी बी आईं की स्थापना 1964 में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक संस्था के रूप में की गई थी। इसका उद्देश्य बुनियादी ढाँचे के विकास से जुड़ी परियोजनाओं के लिए दीर्घकालीन वित्त उपलब्ध कराना था। इसे देश के औद्योगिकीकरण में सहायता करने के लिए स्थापित किया गया था।वर्ष 1976 में इस संस्था का स्वामित्व सरकार को हस्तांतरित कर दिया गया।
1991 के बाद शुरू किए गए सुधारों के नाम पर इस विकास वित्त बैंक को एक वाणिज्यिक बैंक में बदल दिया गया। यह सर्वविदित है कि विकास बैंक के कार्य वाणिज्यिक बैंक के कार्यों से अलग होते हैं।विरासत में मिली समस्याओं और दीर्घकालीन बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए अल्पकालीन उधारी पर निर्भरता के कारण यह बैंक गंभीर संकट में फँस गया।मई 2017 में आर बी आई ने आई डी बी आई बैंक को त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई व्यवस्था के अंतर्गत रख दिया। सितंबर 2018 में इसकी गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों का अनुपात बढ़कर 31.78% हो गया था और निवेश पर प्रतिफल की दर नकारात्मक हो गई थी l
इसी पृष्ठभूमि में एल आई सी ने इसमें निवेश करने का निर्णय लिया था।उस समय अनेक नागरिकों ने इस निर्णय पर चिंता व्यक्त की थी। उन्हें आशंका थी कि एल आई सी संकटग्रस्त बैंक को बचाने के लिए पॉलिसीधारकों के धन को जोखिम में डाल रही है।
इसके जवाब में एल आई सी ने कहा था कि आई डी बी आई में उसका निवेश पूरी तरह व्यावसायिक आधार पर किया जा रहा है। इससे एल आई सी को अपने वितरण नेटवर्क का विस्तार करने और बैंकएश्योरेंस माध्यम को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी। आगे चलकर एल आई सी की रणनीति कामयाब हुई और 2021 से इस बैंक में सुधार परिलक्षित होने लगे और यह यह बैंक लगातार लाभ प्रदर्शित करते हुए सभी परिचालन मानदंडों को पूर्ण कर रहा है l का. महापात्र ने कहा कि नुकसान के समय सार्वजनिक क्षेत्र की एल आई सी का 26367 करोड़ रूपये लगाकर अब लाभप्रद स्थिति में उसका निजीकरण और विदेशीकरण किया जाना पूर्णतः अनुचित है और सरकार के इस निर्णय को वापस लिए जाने तक आंदोलन जारी रखा जायेगा l
सभा को संबोधित करते हुये आल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कंफेडरेशन के नेता का. गोपाल कृष्णन ने कहा कि वित्तीय क्षेत्र अर्थ व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण अंग होता है l वित्तीय क्षेत्रों का विदेशीकरण राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचाएगा l केंद्र सरकार के इस कदम से आम जनता की बचत पर खतरा पैदा हो गया है l इस हड़ताली कार्यवाही के माध्यम से आई डी बी आई बैंक सहित देश के समस्त सार्वजनिक व सरकारी क्षेत्रों के निजीकरण का विरोध किया जा रहा है l सभा को संबोधित करते हुए रायपुर डिवीजन इंश्योरेंस एम्प्लॉइज़ यूनियन के महासचिव का. गजेन्द्र पटेल ने कहा कि बीमा कर्मी निजीकरण की नीतियों के खिलाफ अपना संघर्ष जारी रखेंगे l आज की एकजुटता कार्यवाही देश के सार्वजनिक क्षेत्रों तथा वित्तीय संस्थानों को बर्बाद कर देने की सरकार की नव उदारवादी नीतियो के विरोध में हो रही है l आई डी बी आई बैंक में सरकार व एल आई सी की कुल मिलाकर 60 फीसदी से अधिक की हिस्सेदारी को बेचा जाना पूर्णतः गलत है l वर्ष 2003 में तत्कालीन वित्त मंत्री ने संसद को विश्वास दिलाया था कि इस बैंक में सरकार न्यूनतम 51 प्रतिशत की हिस्सेदारी कायम रखेगी l सरकार का वर्तमान कदम उस वायदे का सरासर उल्लंघन है l यह कदम भाजपा सरकार द्वारा बार -बार दोहराए जा रहे आर्थिक राष्ट्रवाद के दावे से मेल नहीं खाता है l सभा की अध्यक्षता आर डी आई ई यू के अध्यक्ष का. राजेश पराते ने की l सभा में सेंट्रल जोन इंश्योरेंस एम्प्लॉइज़ एसोसिएशन के सह सचिव का. वी. एस. बघेल, का. सुरेन्द्र शर्मा, कोषाध्यक्ष का. संदीप सोनी, सह कोषाध्यक्ष का. ललित वर्मा सहित बड़ी संख्या में मंडल कार्यालय, सी ए बी रायपुर, शाखा क्रमांक 2 एवं समूह बीमा शाखा के बीमा कर्मी उपस्थित थे। जबरदस्त नारेबाजी के साथ सभा की कार्यवाही समाप्त हुई ।









