
रायपुर:छत्तीसगढ़ में किसानों को पारंपरिक खेती के साथ-साथ औषधीय पौधों की खेती से जोड़कर उनकी आय बढ़ाने की दिशा में राज्य शासन लगातार प्रयास कर रहा है। वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में वन विभाग के अंतर्गत छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड द्वारा औषधि एवं सुगंधित पौधों की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी कड़ी में सतावर की खेती किसानों के लिए कम लागत में बेहतर आय का अवसर बनकर उभर रही है।
65 किसान कर रहे 140 एकड़ में सतावर की खेती
सतावर की जड़ों की आयुर्वेदिक और हर्बल औषधियों में मांग बनी हुई है। इसी को देखते हुए धमतरी, कांकेर और कोंडागांव के 65 किसान लगभग 140 एकड़ में सतावर की खेती कर रहे हैं। बोर्ड का उद्देश्य औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देकर किसानों की आय बढ़ाने में सहयोग करना है।
कम पानी और कम लागत, बेहतर कमाई
सतावर की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें अधिक पानी और महंगे कीटनाशकों की जरूरत नहीं होती। फसल में कीट एवं रोगों का प्रकोप भी बहुत कम बताया गया है। शुरुआती दिनों में सिंचाई के बाद सामान्यतः महीने में एक बार हल्की सिंचाई पर्याप्त होती है।
एक एकड़ में सतावर की खेती की लागत लगभग 20 हजार रुपये तक आती है। फसल करीब 18 से 20 महीने में तैयार होती है। एक एकड़ से लगभग 200 से 250 क्विंटल ताजी जड़ें प्राप्त होती हैं, जो सुखाने के बाद करीब 20 से 25 क्विंटल रह जाती हैं। सूखी सतावर की जड़ें बाजार में लगभग 180 से 220 रुपये प्रति किलोग्राम तक के भाव से बिकती हैं।
शासन की मदद से खेती करना हुआ आसान
किसानों को सतावर की खेती के लिए बोर्ड से संपर्क करना होगा। बोर्ड द्वारा जरूरत के अनुसार सतावर के पौधे निःशुल्क उपलब्ध कराए जाएंगे। इसके साथ ही पौधरोपण से लेकर फसल तैयार होने तक किसानों को प्रशिक्षण दिया जाएगा।










