
रायपुर:लोक साहित्य में निहित ऐतिहासिक चेतना, जनजातीय ज्ञान परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को नई दिशा प्रदान करते हुए संस्कृति विभाग के अंतर्गत पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय संचालनालय द्वारा आयोजित दो दिवसीय राज्य स्तरीय सम्मेलन “लोकसाहित्य के दर्पण में अतीत का प्रतिबिंब” का शुक्रवार को सफल समापन हुआ। महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय, रायपुर के सभागार में आयोजित इस सम्मेलन में इतिहासकारों, लोक साहित्य विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और विद्वानों ने लोक परंपराओं में संरक्षित ऐतिहासिक स्मृतियों के महत्व पर व्यापक विमर्श किया।
सम्मेलन का उद्देश्य लोककथाओं, लोकगाथाओं, जनश्रुतियों और पारंपरिक ज्ञान में सुरक्षित इतिहास को पहचानना, उसका प्रलेखन करना तथा भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित करने की दिशा में अकादमिक संवाद को प्रोत्साहित करना था। समापन दिवस पर आयोजित तीन तकनीकी सत्रों में प्रदेश और देश के विभिन्न हिस्सों से आए विशेषज्ञों ने अपने शोधपत्रों के माध्यम से लोक साहित्य और इतिहास के गहरे संबंधों को रेखांकित किया।
’’लोक परंपराओं में सुरक्षित है पीढ़ियों का ज्ञान’’
तृतीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ विदुषी डॉ. सत्यभामा आडिल ने की। सत्र में लोक साहित्य में संरक्षित पारंपरिक ज्ञान और ऐतिहासिक साक्ष्यों पर केंद्रित शोध प्रस्तुत किए गए। डिंडोरी से आए डॉ. विजय चौरसिया ने बैगा जनजाति की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वनस्पतियों और जड़ी-बूटियों पर आधारित यह ज्ञान प्रणाली आज भी अनेक जटिल रोगों के उपचार में प्रभावी है।








