
रायपुर:सीसी लिखने से आप दूसरा अर्थ नहीं लगा लेना , क्योंकि छत्तीसगढ़ में बहुत सारे समस्याओं के पीछे सीसी का ही हाथ है , लुट अपराध , बलात्कार, मारपीट सब के पीछे भी सीसी ही तो है पर छत्तीसगढ़ आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ विकास और विनाश के बीच की रेखा तेजी से धुंधली होती जा रही है। विडंबना यह है कि जिस प्रदेश को कभी तालाबों, नदियों और प्रचुर जलस्रोतों का प्रदेश कहा जाता था, वहीं आज हजारों गांव पेयजल संकट से जूझ रहे हैं। भूजल स्तर 500, 600, 700 फीट तक पहुंच चुका है, अनेक स्थानों पर 900 से 1000 फीट की बोरिंग भी पानी नहीं दे पा रही है। शहरों के बाद अब गांवों में भी टैंकर संस्कृति प्रवेश कर चुकी है।
प्रश्न यह है कि आखिर पानी गया कहाँ?
सरकारें जल संरक्षण पर करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा करती हैं, लेकिन दूसरी ओर उसी पानी को जमीन में जाने से रोकने की पूरी व्यवस्था भी कर रही हैं। इस विरोधाभास का सबसे बड़ा प्रतीक है – सीसी अर्थात कंक्रीटीकरण।
आज विकास का अर्थ केवल सीमेंट और कंक्रीट रह गया है। गांव की गलियां, सड़कें, नालियां, चौक-चौराहे, बाजार, स्कूल परिसर, गौठान, तालाबों की मेड़ें, यहाँ तक कि जल निकासी के प्राकृतिक मार्ग भी कंक्रीट से ढंक दिए गए हैं।
परिणाम यह हुआ कि बरसात का पानी अब धरती की प्यास बुझाने के बजाय सीधे नालों और नदियों में बह जाता है।
पहले मिट्टी की नालियां और कच्चे रास्ते वर्षा जल को धीरे-धीरे जमीन में पहुंचाते थे। पानी रुकता था, रिसता था और भूजल का भंडार भरता था। आज कंक्रीट की नालियां एक बूंद पानी को भी जमीन में नहीं जाने देतीं। पूरा पानी तेज़ी से बहकर प्रदेश से बाहर निकल जाता है।
सबसे दुखद स्थिति तालाबों की है। छत्तीसगढ़ की पहचान रहे तालाब या तो पाट दिए गए, या उन पर अतिक्रमण हो गया। जिन तालाबों में कभी खेतों और गांवों का वर्षाजल पहुंचता था, उनके कैचमेंट क्षेत्र ही खत्म कर दिए गए। तालाबों की मेड़ों पर भवन बन रहे हैं, सामुदायिक केंद्र बन रहे हैं, आंगनबाड़ी बन रही हैं, सड़कें बन रही हैं। पानी के आने के रास्ते बंद हैं और फिर आश्चर्य व्यक्त किया जाता है कि तालाब क्यों सूख रहे हैं।
विडंबना देखिए कि एक ओर जल संरक्षण सप्ताह मनाया जाता है, दूसरी ओर जल पुनर्भरण के प्राकृतिक तंत्रों को व्यवस्थित रूप से समाप्त किया जा रहा है।
सच्चाई यह है कि भूजल संकट का कारण केवल कम वर्षा नहीं है। समस्या यह है कि जो वर्षा हो रही है, उसका पानी धरती तक पहुंच ही नहीं रहा। जब गांव से लेकर शहर तक हर इंच जमीन सीमेंट से ढंक दी जाएगी, तब भूजल कैसे रिचार्ज होगा?
आज आवश्यकता केवल नए बोरवेल खोदने की नहीं है, बल्कि धरती के पेट को भरने की है। यदि सरकारें वास्तव में पेयजल संकट का समाधान चाहती हैं तो उन्हें कंक्रीटीकरण की अंधी दौड़ पर पुनर्विचार करना होगा। हर निर्माण के साथ जल पुनर्भरण की अनिवार्य व्यवस्था करनी होगी। तालाबों, नालों और जलागम क्षेत्रों से अतिक्रमण हटाना होगा। कच्चे क्षेत्रों को बचाना होगा और वर्षाजल को धरती में उतारने की नीति बनानी होगी।
अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब छत्तीसगढ़ में विकास की चमचमाती सीसी सड़कें तो होंगी, लेकिन उन पर चलने वाले लोगों के घरों में पीने का पानी नहीं होगा।
और तब इतिहास यह दर्ज करेगा कि हमने पानी की कमी से नहीं, बल्कि अपनी नीतियों की गलती से जल संकट पैदा किया था। धरती पानी मांगती रही और हम उस पर सीमेंट बिछाते रहे।
( मनोज शुक्ला)







