रायपुर: शंकराचार्य आश्रम बोरिया कला में चल रहे चातुर्मास प्रवचन माला के क्रम को गति देते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ जी महाराज ने कहा कि*भगवान की कथा भक्तों के मनोमल का नाश करती* है। राजा परीक्षित ने श्री सुखदेव जी महाराज से प्रार्थना की। महाभाग्यवान् शुकदेवजी! आप मुझे भगवान की कथाओं का ऐसा उपदेश दीजिए जिससे मेरा मन आसक्ति रहित होकर सर्वात्मा भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं में तन्मय होकर अपना शरीर छोड़ सकूं। भगवान श्री कृष्ण अपने भक्तों के कान के मार्ग से प्रविष्ट होकर हृदय में विराजमान हो जाते हैं और हृदय कमल को पवित्र बना देते है, जैसे शरद ऋतु जल को साफ कर देती है। जिसका हृदय शुद्ध पवित्र हो जाता है वह श्री कृष्ण के चरण कमल को एक क्षण के लिए भी नहीं छोड़ता है, जैसे मार्ग के समस्त क्लेशों से छूटकर घर आया हुआ पथिक अपने घर को नहीं छोड़ना। इसी प्रकार का प्रश्न विदुर जी मैत्रेय जी से कर रहे हैं। मैत्रेय परम ज्ञानी हरिद्वार में विराजमान है भगवत भक्ति से उनका अंतःकरण अत्यंत पवित्र हो चुका है उनके समक्ष विदुर जी उपस्थित होकर पूछते हैं कि संसार के प्राणी सुख की कामना से कर्म करते हैं किंतु महाराज सुख की अपेक्षा उन्हें दुःख ही प्राप्त होता है आप जैसे महात्मा दुःखी प्राणियों के दुख को दूर करने के लिए सारे संसार में विचरण करते रहते है। भगवन्! आप मुझे शांतिप्रद साधन का उपदेश दीजिए जिसके अनुसार आराधना करने से भगवान अपने भक्तों के भक्तिपूत हृदय में आकर विराजमान हो जाए।
कथा के पूर्व श्री शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वानों ने कथा यजमान श्री भारत भूषण शर्मा एवं उनके परिवार से पोथी का पूजन कराकर आरती करवाई।

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