
रायपुर:राजधानी की सड़कें बंधक, जनता हलाकान!उत्सव के नाम पर यातायात की हत्या और कानफोड़ू डीजे का आतंक?
कल शनिवार को रायपुर शहर की सड़कों पर जो हुआ, उसे केवल ‘ट्रैफिक जाम’ कहना समस्या को छोटा करना होगा। यह जाम नहीं था, यह व्यवस्था की असफलता का खुला प्रदर्शन था।
सदर बाजार , बूढ़ापारा, पुरानी बस्ती से रिंग रोड भाठागांव चौक, कुशालपुर, रायपुरा, संतोषी नगर और पचपेड़ी नाका तक—शहर कई हिस्सों में यातायात की रफ्तार ऐसी थी मानो शहर की सड़कें चल नहीं रहीं, कराह रही हों।
कुछ किलोमीटर का रास्ता तय करने में लोगों को घंटों लग रहे थे। एंबुलेंस हो या मरीज, नौकरीपेशा हो या विद्यार्थी, बुजुर्ग हो या आम परिवार—हर कोई जाम में फंसा था।
और इसी जाम के बीच बज रहा था कानफोड़ू डीजे। भक्ति के नाम पर शोर क्यों? गणेश उत्सव रायपुर की आत्मा से जुड़ा पर्व है। इस शहर ने वर्षों तक गणेश उत्सव को अपनी संस्कृति, श्रद्धा और सामाजिक सहभागिता के साथ मनाया है।
गोल बाजार, रामसागरपारा, गुढ़ियारी और पुरानी बस्ती की झांकियां देखने के लिए कभी लोग घंटों कतार में खड़े रहते थे। आसपास के गांवों से लोग परिवार सहित रायपुर आते थे।तब भी भीड़ थी।
तब भी झांकियां थीं। तब भी विशाल प्रतिमाएं थीं। तब भी संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम सड़क पर होते थे।
लेकिन तब उत्सव था, अव्यवस्था नहीं।
आज स्थिति यह है कि डीजे की आवाज इतनी तेज कर दी जाती है कि आसपास के घरों में कंपन महसूस हो। बुजुर्ग परेशान हों, छोटे बच्चे परेशान हों, पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी परेशान हों और बीमार व्यक्ति परेशान हो—फिर भी किसी को फर्क नहीं पड़ता।
क्या भगवान गणेश की भक्ति का पैमाना डीजे का डेसिबल है? भक्ति मन से होती है, स्पीकर की ताकत से नहीं। गणेश जी को श्रद्धा से बुलाइए, शोर से नहीं।
सड़क बची कहां है? लेकिन असली समस्या केवल डीजे नहीं है। रायपुर की यातायात व्यवस्था लापरवाही का परिणाम भुगत रही है। फुटपाथ पर दुकानें हैं। सड़क पर पार्किंग है।
सड़क किनारे पसारे हैं। आवासीय इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियां हैं।
बड़े-बड़े कॉम्प्लेक्स हैं, लेकिन पार्किंग की पर्याप्त व्यवस्था नहीं।
जिस फुटपाथ पर पैदल चलना था, वहां सामान रखा है। जो पैदल यात्री फुटपाथ से बाहर निकला, वह सड़क पर आ गया। सड़क पर पहले से गाड़ियां खड़ी हैं। और फिर सवाल होता है— ट्रैफिक जाम क्यों है? भाई, सड़क पर वाहन चलेंगे या दुकानें? नियम किसके लिए हैं? सबसे बड़ा सवाल प्रशासन से है।
अगर अतिक्रमण गलत है तो कार्रवाई क्यों नहीं? अगर सड़क पर पार्किंग गलत है तो गाड़ियां हटती क्यों नहीं?
अगर व्यावसायिक गतिविधियां नियमों के विपरीत हैं तो उन पर कार्रवाई क्यों नहीं? अगर डीजे की आवाज निर्धारित सीमा से अधिक है तो उसे रोका क्यों नहीं जाता? और अगर नियम हैं ही नहीं, तो फिर यातायात व्यवस्था किस भगवान भरोसे चल रही है?
हर बार कार्रवाई की बात आती है तो कोई न कोई संगठन सामने आ जाता है।
कभी व्यापारी संगठन। कभी दुकानदार।
कभी मकान मालिक। कभी राजनीतिक दबाव। लेकिन आम आदमी की तरफ से कौन खड़ा होगा?
जो व्यक्ति रोज जाम में दो घंटे गंवा रहा है, उसके समय की कीमत कौन देगा?
‘सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का!’
शहर में सड़क किनारे ठेले-पसारे और अस्थायी दुकानों का जाल बढ़ता जा रहा है। कई जगहों पर सड़क किनारे जगह के इस्तेमाल और वाहन खड़े करने तक को लेकर वसूली की बातें सामने आती रहती हैं। यदि ऐसा है तो यह केवल अतिक्रमण का मामला नहीं है। यह संरक्षण और मिलीभगत की व्यवस्था पर गंभीर सवाल है।
क्योंकि जब अतिक्रमणकारी को यह विश्वास हो जाए कि कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता, तब कानून की किताबें केवल अलमारी की शोभा बनकर रह जाती हैं।
पांच सीधे सवाल
पहला— रायपुर की प्रमुख सड़कों और बाजार क्षेत्रों से अतिक्रमण हटाने की स्थायी योजना क्या है? दूसरा— सड़क पर अवैध पार्किंग और फुटपाथ पर कब्जे के खिलाफ नियमित कार्रवाई क्यों नहीं होती? तीसरा— आवासीय क्षेत्रों में बढ़ते व्यावसायिक निर्माण और पार्किंग व्यवस्था की जांच कब होगी? चौथा— धार्मिक आयोजनों के दौरान यातायात प्रबंधन की पूर्व योजना क्यों नहीं बनाई जाती, ताकि पूरा शहर जाम की गिरफ्त में न आए? पांचवां— कानफोड़ू डीजे और अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण पर कार्रवाई केवल कागजों में होगी या जमीन पर भी दिखाई देगी?
साहब ,उत्सव रोकिए मत, व्यवस्था कीजिए गणेश उत्सव का विरोध कोई नहीं कर रहा। उत्सव मनाइए। धूमधाम से मनाइए। भव्यता से मनाइए। लेकिन उत्सव के नाम पर दूसरे नागरिकों का जीवन मुश्किल मत बनाइए। ढोल हो, नगाड़े हों, झांझ हो, मंजीरे हों, भक्ति गीत हों—हमारी अपनी परंपरा में संगीत की कमी नहीं है।
कानफोड़ू शोर को भक्ति का पर्याय बनाने की जरूरत नहीं है। रायपुर को ऐसा गणेश उत्सव चाहिए जिसमें श्रद्धा भी हो और अनुशासन भी। ऐसा उत्सव चाहिए जिसमें गणेश भक्त प्रसन्न हों और शहर के बाकी नागरिक परेशान न हों।
रायपुर को उत्सव चाहिए, अराजकता नहीं। भक्ति चाहिए, बेहिसाब शोर नहीं।
सड़क चाहिए, सड़क पर बाजार नहीं।
व्यवस्था चाहिए, संरक्षण की राजनीति नहीं। अब प्रशासन को तय करना होगा— सड़क आम आदमी के चलने के लिए है या अतिक्रमणकारियों के लिए?
क्योंकि जिस शहर में सड़कें जाम हों, फुटपाथ गायब हों और ऊपर से कानफोड़ू डीजे जनता के धैर्य की परीक्षा ले रहा हो—
वह शहर उत्सव नहीं मना रहा, व्यवस्था की कीमत चुका रहा है।
(मनोज शुक्ला )











