
रायपुर:राजधानी के श्री शंकराचार्य आश्रम में चल रहे चातुर्मास प्रवचन माला के क्रम में शिव पुराण की कथा को विस्तार देते हुए डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने बताया कि संयमी पुरुष में *प्रसाद और क्रोध दोनों रहते हैं* । उन्होंने ब्रह्मा जी के मोह के प्रसंग पर बताया कि ब्रह्मा जी के मन से जब काम की उत्पत्ति हुई, काम को देखकर के ब्रह्मा जी अत्यंत प्रसन्न हुए उसको वरदान दिया कि सारा संसार तुम्हारे वशीभूत रहेगा यहां तक की मैं ब्रह्म और रुद्र और विष्णु भी तुम्हारे अधीन रहेंगे समस्त ऋषियों पर तुम्हारा प्रभाव रहेगा यह बात सुनकर के कामदेव प्रसन्न हुआ कामदेव ने सोचा कि हमारे पिता ब्रह्मा जी की आज्ञा का पालन करना मेरा धर्म है। जो वरदान मुझे प्राप्त हुआ है,जो अधिकार मुझे ब्रह्मा जी के द्वारा प्राप्त हुआ है इसका प्रयोग भी ब्रह्मा जी पर करके परीक्षण कर लेना चाहिए। परीक्षण का यही समय उचित है। ऐसा विचार करके कामदेव ने ब्रह्मा और ऋषियों पर ही अपनी माया चला दी कामदेव का प्रभाव होते ही ब्रह्मा जी अपनी पुत्री पर ही आसक्त हो गए। समस्तऋषिगण भी ब्रह्मा जी की पुत्री संध्या पर आसक्त हो गए यह दृश्य देख कर के धर्म( जो ब्रह्मा जी के पुत्र थे) ने शंकर जी से प्रार्थना की शंकर जी के ब्रह्मा जी के धार्मिक कृत्य की। धिक्कारते हुए शिवजी ने कहा *अपनी पुत्री, अपने भाई की पत्नी, अपने बेटे की पत्नी, और बहन ये चारों कन्या के समान होती हैं* इन पर कुदृष्टि नहीं डालना चाहिए। जो इन पर कुदृष्टि डालता है वह निन्दा का पात्र होता है क्योंकि यह धार्मिक कृत्य है। ब्रह्मा जी ने अपनी इंद्रियों को संयमित किया और ब्रह्मजी ने कामदेव को शाप दिया कि *तुमको शिव के नेत्र की अग्नि से जलना होगा* और भगवान शिव की कृपा से तुम साप मुक्त भी हो जाओगे। संयमी पुरुष में प्रसाद और क्रोध दोनों रहते हैं भगवान शिव संयमी है अतः मेघ के समान उनमें बिजली और पानी अर्थात क्रोध और प्रसाद दोनों ही है। शिवजी संयमी है इसलिए उन्होंने क्रोध और प्रसाद प्रसन्नता दोनों निवास करती शिव की कृपा से ही तुम शाप से मुक्त हो सकते हो।










