
रायपुर: उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़, बिलासपुर में लंबित जनहित याचिका W.P.(PIL) No. 22/2016 में हस्तक्षेपकर्ता (Intervener-in-Person) विकास तिवारी द्वारा छत्तीसगढ़ शासन के मुख्य सचिव को एक विस्तृत अभ्यावेदन प्रस्तुत कर शैक्षणिक सत्र 2026-27 के दौरान गैर-मान्यता प्राप्त प्ले/नर्सरी विद्यालयों में नए प्रवेश पर तत्काल अंतरिम प्रशासनिक रोक लगाने तथा पूरे प्रकरण में प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की गई है।
अभ्यावेदन में कहा गया है कि प्ले/नर्सरी विद्यालयों के विनियमन एवं मान्यता से संबंधित विषय माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष लंबे समय से विचाराधीन है। न्यायालयीन कार्यवाहियों के दौरान राज्य में अनेक ऐसे संस्थानों के संचालन का प्रश्न सामने आया है, जिनकी मान्यता स्थिति को लेकर गंभीर प्रश्न उठे हैं। इस संबंध में न्यायालय द्वारा समय-समय पर व्यक्त की गई चिंताओं एवं कार्यवाहियों का भी उल्लेख अभ्यावेदन में किया गया है।
विकास तिवारी ने कहा कि वर्तमान में शैक्षणिक सत्र 2026-27 प्रारंभ हो चुका है, जबकि प्ले/नर्सरी विद्यालयों के संबंध में कोई नई नियामक व्यवस्था अधिसूचित नहीं की गई है। ऐसी स्थिति में बड़ी संख्या में अभिभावक अनजाने में अपने बच्चों का प्रवेश ऐसे संस्थानों में करा सकते हैं जिनकी मान्यता स्थिति स्पष्ट नहीं है। भविष्य में यदि ऐसे संस्थानों के विरुद्ध कोई नियामक या न्यायिक कार्रवाई होती है, तो उसका प्रतिकूल प्रभाव सीधे विद्यार्थियों एवं अभिभावकों पर पड़ेगा।
अभ्यावेदन में मुख्य सचिव से मांग की गई है कि राज्य के सभी जिलों में संचालित प्ले/नर्सरी विद्यालयों की मान्यता स्थिति का तत्काल सत्यापन कराया जाए तथा जिन संस्थानों के पास विधिसम्मत मान्यता उपलब्ध नहीं है अथवा जिनकी स्थिति विवादित या अप्रमाणित है, उन्हें नए प्रवेश लेने, प्रवेश विज्ञापन प्रकाशित करने तथा शुल्क संग्रहित करने से रोका जाए।इसके अतिरिक्त राज्य शासन से यह भी मांग की गई है कि अभिभावकों के लिए एक सार्वजनिक परामर्श जारी किया जाए तथा जिलेवार मान्यता प्राप्त एवं गैर-मान्यता प्राप्त/सत्यापनाधीन संस्थानों की सूची सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराई जाए, ताकि अभिभावक सही जानकारी के आधार पर निर्णय ले सकें।
विकास तिवारी ने यह भी मांग की है कि न्यायालयीन कार्यवाहियों एवं उपलब्ध अभिलेखों के आलोक में पूरे मामले की उच्चस्तरीय प्रशासनिक समीक्षा की जाए तथा यदि किसी स्तर पर प्रशासनिक लापरवाही, नियामक विफलता या कर्तव्य निर्वहन में चूक पाई जाती है तो संबंधित अधिकारियों एवं उत्तरदायी व्यक्तियों की जवाबदेही निर्धारित कर विधिसम्मत कार्रवाई की जाए।
उन्होंने कहा कि यह पहल किसी व्यक्ति, संस्था या अधिकारी विशेष के विरुद्ध नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों, अभिभावकों और राज्य की शिक्षा व्यवस्था के हितों की रक्षा के उद्देश्य से की गई है। जब तक माननीय उच्च न्यायालय में लंबित प्रकरण का अंतिम निराकरण नहीं हो जाता, तब तक जनहित में एहतियाती प्रशासनिक कदम उठाना आवश्यक है।








