
रायपुर:विधानसभा आवासीय परिसर जीरो पॉइंट में मिश्रा परिवार की ओर से आयोजित श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ में यति प्रवर 1008 डॉ.स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ जी महाराज ने कथा प्रसंग को विस्तार देते हुए बताया कि वृक्षों में भी भगवान का निवास होता है, वृक्ष भी भगवान के स्वरूप माने जाते हैं इसलिए भगवान के रूप में वृक्षों की भी पूजा होती है मनुष्यों को पीड़ा देने में जो कष्ट होता है वही कष्ट वृक्षों को भी काटने में पीड़ा होती है इसलिए कभी भी वृक्षों को अनावश्यक काट छांट करके पीड़ित नहीं करना चाहिए। मनुष्यों के हृदय में बैठा हुआ परमात्मा भी वृक्षों में विराजमान होता है वृक्षों की पूजा से भगवान की पूजा हो जाती है यही सनातन धर्म का वास्तविक उपदेश शास्त्रों ने दिया है, उन्होंने सुखदेव जी के प्रसंग में बताया कि वेद व्यास जी जैसे महात्मा जिन्होंने ब्रह्म सूत्र गीता जैसे ग्रन्थों की रचना की, पीड़ित होकर के कार्त्तभाव से हे पुत्र! हे! पुत्र पुकारते हुए सुकदेव जी के पीछे चले तो सुखदेव की ओर से वृक्षों ने उत्तर दिया।श्री सुखदेव जी महाराज अविकृत परमात्मा है, साक्षात भगवान के स्वरूप हैं। वृक्षों में जो प्रत्यक् चैतन्य है वहीं प्रत्यक् चैतन्य सुखदेव जी महाराज में विराजमान है। वृक्ष और सुखदेव जी में, सुखदेव जी और वृक्ष में कोई भेद नहीं है, सुखदेव जी महाराज सर्वभूत हृदय है, समस्त प्रकृति के हृदय हैं अतः वृक्षों के भी हृदय है। मनुष्य और वृक्षों में सिर्फ उपाधि के भेद के अतिरिक्त कोई भी भेद नहीं है। भारतीय दर्शन न्याय, वैशेषिक के प्रणेता गौतम और कणाद ने भी वृक्षों को प्राणवान माना है। इसलिए श्री सुखदेव जी महाराज की ओर से वेदव्यास जी को वृक्षों ने उत्तर दिया आगे सुधि वक्ता ने बताया कि जो भागवत में है वह सब कहीं है, और जो भागवत में नहीं है, वह कहीं नहीं है।श्रीमद् भागवत हमारे अंतःकरण का दीपक है जो हमारे हृदय में व्याप्त घोर अंधकार को भी नष्ट करने वाला है। संसार के लोगों पर कृपा करके श्री वेदव्यास जी महाराज ने अत्यंत गुह्य पुराण की रचना करके संसारी मनुष्यों पर बहुत बड़ा उपकार किया है।









