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रायपुर:राजधानी के श्री शंकराचार्य आश्रम में चल रहे चातुर्मास्य के प्रसंग पर शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने *कश्यप दिति* के प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पत्नी से ही धर्म अर्थ काम की सिद्धि होती है और पत्नी के सहारे ही मनुष्य संसार के दुख से पार हो जाता है पत्नी पति के लिए बहुत सहायक होती है रक्षा की दृष्टि से पत्नी वज्र के समान कवज बनाकर के रहती है। मनुष्य काम के वशीभूत होकर कहीं कुकर्म न कर बैठे इसके लिए ही विवाह होता है।
उन्होंने कहा विवाह धर्म के संपादन के लिए होता है भोग भोगने के लिए नहीं होता है। दिति को समझाते हुए कश्यप जी कहते हैं कि तुम तो हमारे शरीर का आधा भाग हो तुम्हारे ऊपर भार डालकर हम बेफिक्र रहते हैं तुम्हारे वल से हम इंद्रियों रूपी बड़े-बड़े शत्रुओं पर इस प्रकार विजय प्राप्त करते हैं जैसे कोई किले में बैठकर डाकुओं पर विजय प्राप्त कर लेता है। हम तुमसे कभी उऋण नहीं हो सकते हैं। हम तुम्हारी कामना पूरी करने के लिए भी तैयार है परंतु जरा दो घडी ठहर जाओ क्योंकि यह समय बड़ा प्रतिकूल है इसमें शंकर जी और उनके गण भयंकर वेष में विचरण करते हैं उनके लिए कोई अपना पराया नहीं है हम उन्हीं की इच्छा के अनुसार चलते हैं।
कश्यप जी के समझाने पर दिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा वह तो काम की वशीभूत होकर व्याकुल हो रही थी। अंत में कश्यप जी ने अपनी पत्नी की इच्छा पूर्ण की










