
रायपुर:नदी किनारे की उपजाऊ मिट्टी (कछार की भूमि) हमेशा से सभ्यताओं के विकास और कृषि समृद्धि का केंद्र रही है। आज के आधुनिक युग में, परंपरागत खेती से आगे बढ़कर इस माटी का उपयोग ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बदलने और समृद्धि का एक नया अध्याय लिखने के लिए किया जा रहा है। धमतरी जिले में नदियों के कछार में बसने वाले गांवों की खेती अब एक नया मोड़ लेने जा रही है। जिले की नदियों -महानदी, पैरी, सोंढूर और खारून के किनारे स्थित 152 गांवों में परंपरागत कृषि को अधिक टिकाऊ, जोखिममुक्त और लाभदायक बनाने के लिए एक व्यापक फसल विविधीकरण कार्ययोजना तैयार की गई है। इस महत्वाकांक्षी पहल से लगभग 38 हजार किसान और 30,841.96 हेक्टेयर कृषि रकबा सीधे तौर पर लाभान्वित होगा।
यह योजना धान की खेती को विस्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि किसान को केवल एक फसल के भरोसे रहने की मजबूरी से बाहर निकालने के लिए बनाई गई है। सितंबर- अक्टूबर से शुरू होने वाले इस अभियान के तहत भूमि की प्रकृति, जलभराव और सिंचाई की उपलब्धता के अनुसार खेती का नया मॉडल लागू किया जाएगा।
भूमि की ढाल और क्षमता के अनुसार 3 विशेष जोन
नदी तटवर्ती क्षेत्रों की विविध भू-आकृति को ध्यान में रखते हुए जिले को तीन प्रमुख कृषि जोनों में बांटा गया है। अति निम्न एवं बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में जलभराव वाली जमीनों में धान की मुख्य फसल के साथ-साथ खस, बच और लेमन ग्रास जैसी औषधीय फसलों को बढ़ावा मिलेगा। मध्यम ऊंचाई एवं मौसमी जलभराव वाले क्षेत्र में धान की कटाई के तुरंत बाद कम अवधि वाली दलहन, तिलहन और सब्जियों की खेती की जाएगी। इसी तरह ऊंची एवं बेहतर जल निकासी वाली भूमि क्षेत्र में औषधीय फसलों, फलदार वृक्षों, सब्जियों और जैविक-प्राकृतिक खेती के क्लस्टर तैयार किए जाएंगे।
रबी फसलों का गणित- 5,458 हेक्टेयर में नया खाका
किसानों की आय में बढ़ोतरी के लिए रबी सीजन में 5,458.90 हेक्टेयर क्षेत्र में वैकल्पिक फसलों का आच्छादन प्रस्तावित किया गया है। आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित करने के लिए रबी सीजन में दलहनी फसलों को सर्वाेच्च प्राथमिकता दी गई है, जिसके तहत अकेले चने की बोआई 3,244.10 हेक्टेयर में होगी। इसके अलावा, गेहूं को 662.80 हेक्टेयर, सरसों को 472.50 हेक्टेयर और मक्के को 243.90 हेक्टेयर में उगाने का लक्ष्य है।










