
रायपुर:राजधानी के श्री शंकराचार्य आश्रम में चल रहे चातुर्मास के क्रम को गति देते हुए शंकराचार्य आश्रम थे प्रभारी डॉ. इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने बताया कि *ज्ञानहीन पुरुष ही भोग को अधिक महत्व देते हैं* भोगों से स्मरण शक्ति क्षीण होती है, भोगी व्यक्ति रुग्ण होकर शीघ्र ही पतित हो जाता है। अतःयथासंभव भोगों से बचना चाहिए।
उन्होंने प्रसंग को विस्तार देते हुए बताया कि ब्रह्मा विष्णु समस्त देवता एवं ऋषि भगवान शंकर के पास विवाह का प्रस्ताव लेकर के गए और निवेदन किया की प्रकृति की रक्षा करने के लिए दैत्य का संहार करना अत्यंत आवश्यक है कुछ दैत्यों का संहार हम लोग करते हैं और कुछ दैत्यों का संहार आपके द्वारा होता है। तथा कुछ दैत्य आपके पुत्र के द्वारा मारे जाने के योग हैं अतः आपका विवाह होना अत्यंत आवश्यक आपकी संतान के द्वारा ही प्रकृति की रक्षा हो सकती है। इस सब प्रार्थना को सुनकर भगवान शंकर ने देवताओं से कहा हे सुरगणों मैं सदा तपस्या में संलग्न रहता हूं योगी के रूप में मेरी प्रसिद्धि है निवृत्ति की मार्ग पर में चलने वाला हूं आत्मा में रमण करता हूं निरंजन, अवधूत स्वभाव वाला, आत्मदर्शी कामना शून्य, विकार रहित अमंगल भेषधारी मुझे संसार में कामिनी से क्या प्रयोजन है? मुझे तो सदा ही केवल योग में लगे रहना चाहिए, तथापि आपने जगत के हित के लिए जो हितकर बात कही है उसे मैं अवश्य करूंगा आपके वचन को प्रमुख व गरिष्ठ मानकर अथवा आप की कही हुई बात को पूर्ण करने के लिए मैं विवाह अवश्य करूंगा क्योंकि मैं सदा भक्तों की अधीन रहता हूं भक्तों का कल्याण मेरा लक्ष्य है।
कथा के पूर्व समस्त भक्तों ने शिव पुराण की पोती का पूजन किया तथा संस्कृत विद्यालय के छात्रों ने संस्कृत श्लोकों का पाठ किया।









