
रायपुर:आज की राजनीति में फोटो, पोस्ट और रीलों की भीड़ है… लेकिन एक दौर ऐसा भी था, जब सिर्फ नाम ही काफी होता था — और वो नाम था बृजमोहन अग्रवाल, सुभाष तिवारी, देव जी भाई पटेल और स्वर्गीय ओमप्रकाश पुजारी अप्पू भईया का ।
रायपुर की सड़कों पर, कलेक्ट्रेट के गलियारों में, थानों के बाहर…जब ये चारों खड़े होते थे, तो सिर्फ भीड़ नहीं जुटती थी — व्यवस्था की धड़कनें तेज हो जाती थीं।
ओमप्रकाश पुजारी का जब रिक्शे पर माइक लेकर खाली चौक में खड़े हो जाना… और कुछ ही मिनटों में उनके धारदार लच्छेदार भाषणों से उसे जनसैलाब में बदल देना —
ये कोई साधारण कला नहीं थी, ये जनता के दिलों पर राज करने की ताकत थी।उस दौर मेंबृजमोहन अग्रवाल,
ओम प्रकाश पुजारी, सुभाष तिवारी, देव जी भाई पटेल — ये सिर्फ नाम नहीं थे, ये आंदोलन की पहचान थे।
कांग्रेस का मजबूत शासन था, सत्ता का रौब था…रायपुर में विद्या चरण शुक्ल श्यामाचरण शुक्ला का राज था
लेकिन ये चार लोग युवाओं की आग लेकर निकलते थे —रेलें रुकती थीं, शहर थम जाता था, और रायपुर बंद हो जाता था। किसी कार्यकर्ता के साथ अन्याय हुआ? तो ये लोग सिर्फ बयान नहीं देते थे —रायपुर से निकलते थे, और वहीं जाकर हिसाब बराबर करते थे।
बृजमोहन अग्रवाल रणनीति के धुरंधर थे, अप्पू भईया और सुभाष तिवारी — शब्दों के ऐसे योद्धा,
जिनकी आवाज़ से भीड़ न रुक जाती थी ।और देव जी भाई पटेल — भाजयुमो संगठन की रीढ़, जो हर कार्यकर्ता को जोड़ते थे।पुजारी जी एक अच्छे व मानवीय पहलू को ध्यान में रखने वाले अधिवक्ता भी थे, वे हमेशा काला कोट गरीब मजलूम जनता व कार्यकर्ता के लिए पहनते थे और केस भी लड़ते थे, फीस मिला तो ठीक नहीं मिला तो भी ठीक।
ये वो समय था जब भाजयुमो पद और पैसे से नहीं, पसीने और संघर्ष से चलती थी।आज सब कुछ है — संसाधन, मंच, सोशल मीडिया…लेकिन वो जुनून, वो जोखिम उठाने का जिगर, वो सड़कों वाला संघर्ष — कहीं खो गया है।
अप्पू भईया असमय चले गए…
लेकिन सच ये है कि वो सिर्फ एक व्यक्ति नहीं थे — वो एक दौर थे, एक तेवर थे, एक चेतना थे। आज उनकी जन्म जयंती पर… सवाल सिर्फ उन्हें याद करने का नहीं है,सवाल है — क्या हम उस संघर्ष को जी भी पा रहे हैं?







