
रायपुर: भारत की सांस्कृतिक परंपरा विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। हमारे पूर्वजों ने ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, चिकित्सा, कला और साहित्य के विविध आयामों को पांडुलिपियों, ताम्रपत्रों और हस्तलिखित ग्रंथों के रूप में संरक्षित किया है। ये केवल ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की जीवंत आत्मा हैं। “ज्ञानभारतम राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण” के माध्यम से हम इस अमूल्य धरोहर को खोजने, सहेजने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का एक व्यापक और दूरदर्शी अभियान चला रहे हैं।
छत्तीसगढ़ में इस अभियान को जन आंदोलन का स्वरूप देने की दिशा में लगातार कार्य किया जा रहा है। गांव-गांव और घर-घर तक पहुँचकर पांडुलिपियों की खोज का कार्य किया जा रहा है, जिससे समाज की सहभागिता भी सुनिश्चित हो रही है। इस प्रयास का सकारात्मक परिणाम यह है कि नागरिक स्वयं आगे आकर अपने निजी संग्रहों में सुरक्षित दुर्लभ पांडुलिपियों को साझा कर रहे हैं।
हाल ही में दामाखेड़ा क्षेत्र में 326 वर्ष पुरानी दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियों की प्राप्ति इस अभियान की बड़ी सफलता के रूप में सामने आई है। इन पांडुलिपियों में तत्कालीन समाज, धार्मिक मान्यताओं और ऐतिहासिक परिस्थितियों का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो शोध और अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी क्रम में बिलासपुर जिले के ऐतिहासिक स्थल मल्हार से लगभग 2,000 वर्ष पुराना ताम्रपत्र प्राप्त होना छत्तीसगढ़ की गौरवशाली विरासत को और अधिक समृद्ध करता है। इस ताम्रपत्र में प्राचीन काल के शासन, दान व्यवस्था और सामाजिक संरचना का उल्लेख मिलता है, जो यह दर्शाता है कि उस समय की प्रशासनिक व्यवस्था कितनी विकसित और संगठित थी।
अंबिकापुर एवं अन्य क्षेत्रों में भी 17 वीं शताब्दी सहित विभिन्न कालखंडों की दुर्लभ पांडुलिपियों की खोज की गई है। इन पांडुलिपियों का “ज्ञानभारतम ऐप” के माध्यम से डिजिटलीकरण किया जा रहा है, जिससे उनका दीर्घकालीन संरक्षण सुनिश्चित हो सके।








