रायपुर:शंकराचार्य आश्रम में चल रहे चातुर्मास प्रवचन माला के क्रम को गति देते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. स्वामी इंदुभवानंद तीर्थ महाराज ने भगवान शिव के किरात स्वरूप की व्याख्या करते हुए बताया कि इंद्रकील पर्वत पर अर्जुन भगवान शंकर की तपस्या के लिए पहुंचे इस समय दुर्योधन ने अर्जुन के अनिष्ट की भावना से मूक नामक दैत्य को अर्जुन का वध करने हेतु भेजा। अर्जुन विचार करने लगे की जिसके देखने से अपना मन प्रसन्न हो वह निश्चय ही हितैषी होता है, और जिसके देखने से मन में व्याकुलता उत्पन्न हो वह अवश्य ही शत्रु होता है। सदाचार से कुल का, शरीर से भोजन का, वचन के द्वारा शास्त्र ज्ञान का, तथा नेत्र के द्वारा स्नेह का पता लग जाता है। आकार, गति, चेष्टा, संभाषण एवं नेत्र तथा मुख के विकार से मनुष्य के अंतःकरण की बात भी ज्ञात हो जाती है। इसकी चाल ढाल और गति के देखने से निश्चित ही ज्ञात होता है कि यह दुर्योधन का भेजा हुआ मेरा शत्रु है। अतः इसको मारना चाहिए। अर्जुन की रक्षा के लिए भगवान शिव ने भी मूक दैत्य को बाण मारा और अर्जुन ने भी अपने बचाव में मूक पर बाण चलाया भगवान शिव का बाण पूछ से प्रविष्ट होकर के मुख से निकलकर पृथ्वी में समाहित हो गया और अर्जुन का बाण मुख से प्रविष्ट होकर पुच्छभाग से निकलकर जमीन में गिर गया। अर्जुन ने अपना बाण उठा लिया बाण को लेकर किरात के दूत एवं अर्जुन में विवाद हुआ।अन्त में भगवान शिव स्वयं किरातेश्वर के रूप में अर्जुन के सामने उपस्थित हो गए। अर्जुन ने भगवान किरातेश्वर की विधिवत स्तुति की भगवान ने प्रसन्न होकर उन्हें पाशुपतास्त्र प्रदान कर दिया।
कथा के पूर्व श्री शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वानों ने भगवान शिव का पूजन करके आरती की तथा जगतगुरु कुलम के समस्त छात्रों ने मंगलाचरण संपन्न किया।

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