रायपुर:आपकी कॉल और इंटरनेट किसी “स्पेस स्टेशन” से नहीं, बल्कि धरती के नीचे से आते हैं! ऐसे काम करता है इंटरनेट का असली जाल।
जब हम इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं तो लगता है सब कुछ वायरलेस है मोबाइल नेटवर्क, Wi-Fi, क्लाउड लेकिन असल सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है।
दरअसल, दुनिया का लगभग 99% इंटरनेशनल इंटरनेट ट्रैफिक ‘सबमरीन ऑप्टिकल फाइबर केबल्स’ के जरिए आता है, जो समुद्र की गहराइयों में बिछे हुए हैं।
1. ये केबल कैसे होते हैं?
समुद्र में बिछाए गए इन फाइबर केबल्स की मोटाई लगभग एक बॉलपेन जितनी होती है। इनकी लंबाई हजारों किलोमीटर होती है जैसे अमेरिका से भारत तक
अंदर से ये बेहद मजबूत ग्लास फाइबर से बने होते हैं, जो डेटा को प्रकाश की गति से ट्रांसफर करते हैं।
2. इन्हें समुद्र में कैसे बिछाया जाता है?
खास “केबल लेयर शिप” द्वारा दिन में 100–200 किमी तक तार बिछाए जाते हैं केबल को समुद्र की सतह में दबाया जाता है ताकि तूफानों, लहरों और शार्क से बचाया जा सके कई बार शार्क इन केबल्स को चबाने लगती हैं इसलिए अब इन पर “शार्क प्रूफ” कोटिंग लगाई जाती है!
3. क्या फायदा होता है इन केबल्स का?
तेज़ स्पीड: एक सेकंड में टेराबाइट्स डेटा ट्रांसफर कम लेटेंसी: सैटेलाइट के मुकाबले ज़मीन से जुड़ी तकनीक तेज़ और विश्वसनीय होती है सस्ती लागत: लंबे समय में डेटा ट्रांसफर की लागत कम होती है
4. कौन-कौन से देश इससे जुड़े हैं?
पूरी दुनिया में 400 से ज़्यादा सबमरीन केबल्स बिछे हैं भारत के तटों से भी कई बड़े केबल्स जुड़े हैं जैसे चेन्नई, मुंबई, विशाखापत्तनम से Google, Facebook, Reliance, Airtel जैसी कंपनियाँ अपने निजी समुद्री केबल्स बिछा रही हैं









