
रायपुर:जय रामजी की जय
– इन दिनों राम नाम की खूब चर्चा है। होनी भी चाहिए, क्योंकि राम की महिमा अपरंपार है। दरअसल, राम की महिमा समझने–समझाने के लिए आजकल वैज्ञानिक सोच और विचारवान टाइप के प्रबुद्ध ज्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं। वे रामजी को अलग कसौटी में कसने में कोशिश कर रहे हैं। इसी तरह साहित्यिक जमात भावनात्मक ढ़ंग से रामजी को परिभाषित कर रही है।
– बहुत अच्छी बात है, ऐसी कोशिशों का स्वागत होना चाहिए। लेकिन विचारवान महानुभवों को रामजी की सबसे सटीक महिमा बताने वाले गोस्वामी तुलसीदास के सूत्र को भी समझना चाहिए। रामचरित मानस, विनय पत्रिका, कवितावली में गोस्वामी जी हर वर्ग के लोगों को समझाते हैं।
– कविता, शेरो-शायरी के अंदाज में रामजी को शबरी के राम, अहिल्या के राम, केंवट के राम…कहकर एक नया नरेटिव बनाया जा रहा है। उनकी बात तो सही है कि राम जी सब के हैं। इसका-उसका वाली भेद बुद्धि ही रामजी के समझने-समझाने में सबसे बड़ी बाधा है।
– अब शबरी मइया के प्रसंग से समझने की कोशिश करते हैं। रामजी जब शबरी जी के आश्रम गए, तो उन्होंने कैसे पूजा की ? गोस्वामीजी बताते हैं कि शबरी जी राम-लक्ष्मणजी से लिपट गई और उन्हें आसन पर बिठाया। अब आप पूछिए सवाल कि आसन पर बिठाने के बाद शबरी माता ने तिलक, चंदन, आरती किया क्या ? बल्कि माता ने तो सीधे मीठे कंदमूल अर्पित कर दिए।
– अब लग सकता है कि रामजी की पूजा में समस्त विधियों का पालन नहीं हुआ तो क्या पूजा अधूरी हो गई या पूरी नहीं हुई। यहां तो शास्त्र मर्यादा का पालन नहीं हुआ। गौर करने वाली बात यह है कि माता ने शास्त्र विधि का पालन नहीं किया तो रामजी को इतना रस आया कैसे ?
– अब आप ही बताइए कि जब कोई बच्चा बाहर से घर आता तो माता हाथ-पैर धुलाकर सीधे खाना ही खिलाती है ना… या फिर चंदन, टीका और आरती करके पूजन करती है। दरअसल, रामजी को शबरी जी में माता का भाव दिखा, इसलिए उन्हें सुरस लगा।
– साफ संकेत है कि रामजी को जब तक अनुरागयुक्त होकर स्नेह के रस में डूबकर समझा नहीं जाएगा, तब तक हमारे आपके बुद्धि की जड़ता दूर नहीं होनी वाली।
– रामजी शुद्ध घी के लड्डू की तरह है, जिसमें अनुराग का शीरा मिलना पड़ेगा, तभी मीठा होगा, वरना शुद्ध घी में भुना बेसन मीठा नहीं लगता।
– महाराजजी कहते हैं कि व्यक्ति देश के आधार पर टिका हुआ है और देश काल के आधार पर। इसमें काल ही शक्तिशाली है। इस कलयुग में पूरे वातावरण में तमोगुण व्याप्त है और सत्वगुण सिकुड़ गया है, यही कारण है कि रामजी की अलग-अलग व्याख्या हो रही है। जबकि रामजी एकमात्र शाश्वत हैं।
– रामजी न युद्धक राम हैं न किसी वर्ग, समाज के हैं, वे हम सब के हैं। हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि रामजी को समझने या समझाने के लिए जिस प्रकार के अंत:करण की आवश्यकता है, वैसा अंत:करण हमारे पास नहीं है। आशय यह है कि सही पद्धति से रामजी का अनुभव किया जाएगा, तो सार्थक परिणाम आएंगे।







