रायपुर:डूण्डा कौशल्या बिहार में साहू परिवार एवं समाज की ओर से आयोजित श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह में बाल लीलाओं के प्रसंग पर शंकराचार्य आश्रम के प्रमुख डॉक्टर इन्दुभवानन्द महाराज ने बताया कि लीला से प्रपंच की विस्मृति होती है तथा मन भगवान में लीन हो जाता है, कुछ लीलाएं समाधि लगाने के लिए होती हैं कुछ लीलाएं ज्ञान बढ़ाने के लिए होती हैं कुछ लीलाएं रसास्वादन के लिए होती हैं कुछ लीलाएं भगवान के ऐश्वर्य एवं माधुर्य के परिचय के लिए होती हैं। इन सब लीलाओं का उद्देश्य प्रपंच विस्मरण पूर्वक भगवदासक्ति बढ़ाकर भगवन्मय बनाने के लिए हैं। भगवान श्री कृष्णा कभी दीवार पकड़ कर खड़े हों और गिरने लगे तो अपने हाथ की परछाई पकड़ कर खड़े रहने की कोशिश करें।
कभी गोपिया पूछे की लाला तुम्हारी नाक कहां है तो हाथ रख कर बतावे कि ये है। दांत कहां है? तो उसे बताने के लिए मुस्कुरा देते दें। आंख कौन सी है तो आंख थोड़ी टेढी करके दिखा दें, तुम्हारी छाती पर यह सुनहरी भौंरी है यह क्या है? यह क्या तुम्हारी वधू है तुम अपनी श्रीमती जी को साथ लेकर आए हो इस पर श्री कृष्ण स्वयं हंसते थे और सबको हंसा देते थे।
यशोदा मैया का मन कभी कृष्ण में लगता है और कभी घर में फँसता है, उनका मन चंचल हो रहा है। फिर भी वे घर को इसलिए नहीं छोड़ पाती थी क्योंकि लाला के लिए माखन मिश्री कौन तैयार करेगा, रोटी कौन बनाएगा, पलंग कौन बिछाएगा आदि आदि। घर का काम तो वह छोड़े जिसका काम अपने बेटी बेटे के लिए होता है, जमाई बहू के लिए होता है यशोदा मैया का काम श्री कृष्ण की सेवा के लिए है। कभी-कभी लाला की सेवा के लिए लाला से अलग हो जाती थी, सेवा ऐसी चीज है कि उसके लिए कभी-कभी स्वामी को भी छोड़ना पड़ता है भगवान से बड़ी भगवान की सेवा होती है। सेवा के लिए भगवान को भी कभी-कभी छोड़ना पड़ता है पर सेवा को नहीं छोड़ा जा सकता है। कथा के पूर्व यजमान श्री सुंदरलाल साहू श्रीमती विद्या साहू रघुनाथ साहू सुखदेव साहू आदि ने पोथी का पूजन करके आरती की। आज के इस सत्संग में गेंदालाल साहू, बलराम, बालकृष्ण, सुखलाल, राधे साहू, भरत साहू, गंगासाहू ,नंदकिशोर देवांगन रामकुमार पुरोहित आदि श्रद्धालु उपस्थित थे।














