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रायपुर:राजधानी के श्री शंकराचार्य आश्रम बोरियाकला रायपुर में चल रहे चातुर्मास प्रवचन माला के क्रम को गति प्रदान करते हुए डॉ. इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने बताया कि भोग भगवत् प्राप्ति का साधन नहीं है भगवत् प्राप्ति का साधन केवल शांति है। शांति के द्वारा शम के द्वारा भगवान की प्राप्ति हो जाती है जब वह शांति इंद्रियों में आती है तो दम कहलाती है, जब वह शांति मन में आती है तो शम कहलाती है, और जब वह शांति शरीर में आती है तितिक्षा कहलाती है, और जब शांति कर्म में आती है तो उपरति कहलाती है। शांति के बिना परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती है अनंत परमात्मा को प्राप्त करने के लिए अनंत शांति की आवश्यकता है।
संसार के सुख के लिए चिंतामणि पर्याप्त होती है स्वर्ग के सुख के लिए कल्पवृक्ष की आवश्यकता होती है यदि कोई व्यक्ति स्वर्ग का सुख भी प्राप्त करना चाहता है मृत्यु लोक का सुख प्राप्त करना चाहता है तथा अंत में परमात्मा से एकाकर होकर परमात्मा की प्राप्ति करना चाहता है तो उसे गुरु की आवश्यकता होती है गुरु की कृपा से ही उसको योगी दुर्लभ बैकुंठ सुख की भी प्राप्ति हो जाती है। सूत जी ने शौनक आदि ऋषियों को उपदेश देते हुए कहा कि श्रीमद् भागवत शास्त्र मंत्र है जिस प्रकार सर्प के विष से मुक्त होने के लिए मंत्र की आवश्यकता होती है, वैसे ही संसार रूपी सर्प से मुक्त होने के लिए श्रीमद् भागवत के ज्ञान की आवश्यकता होती है। श्रीमद् भागवत भा का ज्ञान श्री सुकदेव जी महाराज से प्राप्त होता है। इसलिए श्री सुकदेव जी को सुक,तोता का स्वरूप माना गया है। सुक,तोता जो सुनता है वही व्यक्त करता है इससे सिद्ध है श्रीमद् भागवत शास्त्र मंत्र है, मंत्र के श्रवण मात्र से ही संसार का विष नष्ट हो जाता है।कथा के पूर्व श्रोताओं ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की पोथी का पूजन किया तत्पश्चात ब्राह्मणों ने वेदों के मंत्रों का पाठ किया।










