
रायपुर:”एक ओर 100 रुपये का PUC नहीं होने पर 5000 – 10,000 रुपये का चालान आ रहा है, दूसरी ओर प्रदूषण फैलाने वाले औद्योगिक क्षेत्रों, नदियों में गिरते अपशिष्ट और जहरीली हवा की शिकायतों पर वर्षों से जांच, नोटिस और समितियों का दौर चल रहा है। सवाल कानून का नहीं, कानून के समान अनुपालन का है। यदि आम नागरिक के मोटर सायकल कार पर कैमरे की नजर है तो उद्योगों की चिमनियों और नदियों में गिर रहे अपशिष्ट पर भी उतनी ही कठोर डिजिटल निगरानी क्यों नहीं? जनता पूछ रही है कि पर्यावरण का सबसे बड़ा अपराधी आखिर कौन है — 100 सीसी की मोटरसाइकिल या कार चलाने वाला या हजारों टन उत्पादन करने वाली प्रदूषणकारी इकाइयां?”
पिछले कुछ महीनों से मेरे पास गरीब मोटरसाइकिल वाले छोटे-छोटे कार के मालिक रोज आ रहे हैं भैया हमने टोल टैक्स पार किया और ही चालान आ गए हैं , हमने घर के पास चौक में टर्निग ले ली चालान आ गए हैं , सब्जी खरीदने बाजार गया था हेलमेट का चालान आ गए, हम दोनों पति-पत्नी बच्चों को लेकर पीटीएम में स्कूल गए थे ई चालान आ गया है , ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मानो प्रदेश का सबसे बड़ा अपराधी वाहन चालक और वाहन मालिक ही हो गया हो।
टोल प्लाजा पार करते ही ई-चालान, चौक-चौराहे पर कैमरा, हेलमेट नहीं तो चालान, सीट बेल्ट नहीं तो चालान, प्रदूषण प्रमाण पत्र नहीं तो ₹5000 का चालान, बीमा नहीं तो चालान, ज़ेब्रा क्रॉसिंग पार की तो चालान। ऐसा लगता है कि प्रशासन की पूरी शक्ति केवल सड़क पर चलने वाले आम आदमी के लिए ही सुरक्षित रखी गई है।
प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण केवल मोटरसाइकिल और कार मालिक हैं?
यदि किसी दोपहिया वाहन के पास प्रदूषण प्रमाण पत्र नहीं है तो उसे दंडित किया जा रहा है। लेकिन दूसरी ओर उरला, बिरगांव, सिलतरा, अछोली, भनपुरी, गोढ़ी, धरसीवां, नेवरा और तिल्दा क्षेत्र के अनेक औद्योगिक क्षेत्रों में वर्षों से कारखानों की चिमनियां काला धुआं उगल रही हैं। आसपास के गांवों और बस्तियों की छतों, आंगनों और दीवारों पर कालिख जम रही है। लोगों के कपड़े, पानी की टंकियां और घरों की छतें तक काली हो रही हैं। क्या यह प्रदूषण नहीं है?
खारुन और महानदी जैसी नदियां शहरों के नालों और औद्योगिक अपशिष्टों का बोझ झेल रही हैं। करोड़ों लीटर गंदा पानी सीधे नदियों में छोड़ा जाता है। नदी का पानी बदबूदार हो रहा है, जलीय जीवन प्रभावित हो रहा है, लेकिन कितने नगर निगमों, नगर पालिकाओं और उद्योगों पर उतनी ही तेजी से कार्रवाई हुई जितनी एक बाइक चालक पर होती है?
सवाल कानून का नहीं है। कानून का पालन हर नागरिक को करना चाहिए। हेलमेट पहनना चाहिए, बीमा होना चाहिए, प्रदूषण प्रमाण पत्र भी होना चाहिए। लेकिन कानून का डंडा केवल कमजोर पर ही क्यों चलता दिखाई देता है?
यदि एक गरीब व्यक्ति की 15-20 हजार रुपये की पुरानी मोटर सायकल पर 20-25 हजार रुपये का चालान हो सकता है, तो करोड़ों रुपये का प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर कितने करोड़ का दंड लगाया गया? यदि कैमरे हर चौक पर आम आदमी की गलती पकड़ सकते हैं, तो प्रदूषण उगलती चिमनियों और नदियों में गिरते गंदे पानी की निगरानी के लिए ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं दिखती?
जनता यह नहीं कह रही कि नियम तोड़ने वालों को छोड़ दिया जाए। जनता केवल इतना पूछ रही है कि कानून सबके लिए समान क्यों नहीं दिखता? सड़क पर चलने वाले व्यक्ति से लेकर करोड़ों के उद्योग तक, सबके लिए एक ही पैमाना क्यों नहीं होना चाहिए?
लोकतंत्र में सबसे बड़ा विश्वास यही है कि न्याय समान हो। यदि आम आदमी पर कार्रवाई हो तो बड़े उद्योगों, प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों और सरकारी निकायों पर भी उतनी ही कठोर कार्रवाई दिखाई देनी चाहिए। अन्यथा लोगों के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या कानून केवल उन्हीं पर लागू होता है जो सबसे कमजोर हैं?
(मनोज शुक्ला)






