
रायपुर:विकास की असली परीक्षा तब होती है जब वह समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक पहुँचे। छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिला मुख्यालय से करीब 94 किलोमीटर दूर, घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों के बीच बसा अबूझमाड़ का धोबे गांव आज इसी बदलते भारत और बदलते छत्तीसगढ़ की एक जीती-जाती मिसाल बन चुका है। जो इलाका कभी सिर्फ नक्सली हलचलों और विकास से दूरी के लिए जाना जाता था, आज वहां जल जीवन मिशन ने उम्मीदों का एक नया सवेरा ला दिया है। अबूझमाड़ के इस सुदूर अंचल में पहली बार घर-घर शुद्ध पेयजल की सुविधा पहुंची है, जिसने ग्रामीणों की जिंदगी की पूरी तस्वीर ही बदल कर रख दी है।
पूर्व में संघर्षों का दौर नदी-नालों के दूषित पानी से जंग
वर्षों तक धोबे गांव के ग्रामीणों के लिए सुबह की शुरुआत पानी के बड़े संघर्ष के साथ होती थी। अत्यंत दुर्गम क्षेत्र होने के कारण यहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचा तो दूर, पीने का साफ पानी मिलना भी एक बड़ी चुनौती थी। गांव के लोग पीने के पानी के लिए पूरी तरह से स्थानीय नदी, नालों और झरनों पर निर्भर थे। पहाड़ों से बहकर आने वाला यह पानी न सिर्फ दूषित होता था, बल्कि इसके उपयोग से ग्रामीण लगातार जलजनित बीमारियों की चपेट में रहते थे। विशेषकर महिलाओं और बच्चों का एक बड़ा समय सिर्फ पीने का पानी ढोने में ही बीत जाता था।
’जल जीवन मिशन- ऐसे बदली धोबे गांव की तस्वीर’
ग्रामीणों की इस दशकों पुरानी और बेहद संवेदनशील समस्या को देखते हुए जिला प्रशासन और जल जीवन मिशन की टीम ने इस चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में कदम रखा। विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों और सुरक्षा की चुनौतियों को पार करते हुए गांव में योजनाबद्ध तरीके से काम शुरू किया गया।








