
रायपुर: शंकराचार्य आश्रम बोरियाकला में चल रहे चातुर्मास प्रवचन माला के क्रम में शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने श्रीमद्भागवत की कथा के प्रसंग में बताया कि संसार की संपत्ति समस्त अनर्थों का मूल होती है। सूर्य ने अपने भक्त एवं सखा सत्राजित् को उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर के स्यमन्तक मणि प्रदान कर दी। स्यमन्तकमणि को गले मैं धारण करके सत्राजित् द्वारका की सभा में मणि प्रदर्शन करने हेतु उपस्थित हुआ भगवान श्री कृष्ण ने मणि को सदुपयोगी बनाने हेतु द्वारका के खजाने में जमा करने के लिए कहा किंतु सत्राजित् ने भगवान की आज्ञा नहीं मानी और उन पर ही अविश्वास किया। मणि उसके हाथ से प्रसेन के हाथ में गई। उसका भाई प्रसेन जंगल में शेर के हाथों मारा गया। और शेर भी मणि के कारण भालू के हाथों मारा गया। मणि के कारण ही सत्राजित् एवं शतधन्वा दोनों भी मारे गए और तो और बलराम जी के मन में भी श्री कृष्ण के प्रति अविश्वास का उदय हुआ धन के लिए शेष बलराम को भी भगवान श्री कृष्ण पर संशय हो गया। रुक्मणी सभी पटरानियों में श्रेष्ठ होने के कारण मणि की अभिलाषा करने लगी। सत्यभामा अपने पिता से प्राप्त होने के कारण मणि पर अधिकार करना चाहती थी और जाम्बवती तो पिता से दहेज में मिली है इस कारण उस पर अधिकार करना चाहती थी। भगवान श्री कृष्ण मणि से दूर रहकर के यही संदेश दे रहे हैं कि *संपत्ति समस्त अनर्थोंका मूल होती है इसलिए इसे दूर रहना ही उत्तम है।








