रायपुर: शंकराचार्य आश्रम बोरियाकला में चल रहे चातुर्मास प्रवचन मालाक्रम को गति देते हुए शंकराचार्य आश्रम की प्रभारी डॉ स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने श्रीमद्भागवत के रास रहस्य की व्याख्या करते हुए बताया कि भगवान की लीला प्रपंच का विस्मरण कर देती है। रासलीला काम की नहीं, काम मर्दन की लीला है। कामदेव को बड़ा अभिमान हो गया था। कामदेव के अभिमान को शून्य करने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने रासलीला का आयोजन किया था। बड़े-बड़े सिद्ध अमलात्मा महापुरुष भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य प्राप्त करने के लिए गोपी भाव को प्राप्त होते हैं। भगवान शिव एवं सुखदेव जी महाराज भी भगवान की इस रास लीला के सहचर हैं। नित्य सिद्ध, साधन सिद्ध, अनुग्रह सिद्ध, श्रुति रूपा, ऋषि रूपा एवं साधारण गोपी सबको ही भगवान की प्राप्ति होती है, किसी को शरीर से भगवान की प्राप्ति होती है और किसी को मन से भगवान की प्राप्ति होती है। भगवान के संयोग से ही उन्हें परम रस का अनुभव होता है।और गोपियों का भगवान से वियोग भी होता है। वियोग के ताप से हृदय पिघल जाता है हृदय की कठोरता दूर हो जाती है तथा संयोग का वास्तविक लाभ प्राप्त हो जाता है जब तक वियोग नहीं होता है तब तक संयोग का सुख भी प्राप्त नहीं होता है, संयोग का सुख तो वियोग से ही प्राप्त होता है। संयोग वियोग से ही रस की पूर्ण निष्पत्ति होती है और रसों के समूह को ही रास कहा जाता है।
कथा के पूर्व शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वानों ने यजमान भारत भूषण शर्मा एवं उनके परिवार से भागवत भगवान की पोथी का पूजन कराकर आरती संपन्न कराई।

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