
रायपुर: भारत का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक कहा जाने वाला राज्य छत्तीसगढ़ को अब तक 500 करोड़ से ज्यादा के राजस्व नुकसान की बात सामने आयी है। सूत्रों के मुताबिक इसकी वजह राजस्थान सरकार से मिलने वाले सालाना 1000 करोड़ के राजस्व में कमी होना बताया जा रहा है। असल में राजस्थान राज्य द्वारा पिछले 10 वर्षों में छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में चल रही परसा ईस्ट केते बासेन (पीईकेबी) कोयला खदान के विभिन्न शुल्कों के एवज में अब तक करीब 7000 करोड़ से ज्यादा का राजस्व छत्तीसगढ़ के खजाने में जमा कराया जा चुका है। जिसके बीते छह महीने से बंद होने के बाद जहां एक तरफ राज्य को अबतक 500 करोड़ ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ा है। तो वहीं खदान में कार्यरत प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष स्थानीयों को भी बेरोजगार होने का दंश झेलना पड़ रहा है। राजस्थान में राज्य सरकार द्वारा उनके सात ताप विद्युत घरों की स्थापना में करीब 40,000 करोड़ का निवेश किया गया है जिसके संचालन के लिए केंद्रीय कोयला मंत्रालय ने आवश्यक कोयले की आपूर्ति हेतु छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में तीन कोल ब्लॉकों का आवंटन किया गया है।
पीईकेबी के बंद हो जाने से राजस्थान राज्य के बिजली घरों में भी कोयले की आपूर्ति के लिए कोहराम मच गया है। इसके अलावा राज्य के संयत्रों में बिजली उत्पादन को बरकरार रखने के लिए बाहर से महंगा कोयला खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इसके बावजूद राजस्थान में उपजे कोयला संकट के सामने आने के बाद बीते मंगलवार की रात को ही मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और ऊर्जा मंत्री हीरालाल नागर इसका समाधान खोजने के लिए दिल्ली पहुंचे थे। जहां उन्होंने बुधवार को केन्द्रीय ऊर्जा मंत्री आरके सिंह और केन्द्रीय कोयला मंत्री प्रह्लाद जोशी से मुलाकात कर राजस्थान को इस संकट से उबारने के लिए बातचीत की है। इस दौरान केंद्रीय उर्जा मंत्री और कोयला मंत्री ने सीएम को मदद का आश्वासन दिया है. इस दौरान कोल इंडिया से कोयले की अतिरिक्त रैक देने पर भी सहमति बनी है।
दरअसल राजस्थान राज्य की विद्युत उत्पादन कंपनी के 4340 मेगावाट के चार बिजली घरों के लिए छत्तीसगढ़ में तीन कोयला खदानों, परसा ईस्ट केते बासेन, परसा और केते एक्सटेन्सन का आवंटन हुआ है। परन्तु कंपनी द्वारा पिछले 10 वर्षों में केवल परसा ईस्ट केते बासेन की खदान में ही कोयले के खनन का कार्य शुरू किया जा सका है। इसके द्वितीय चरण में खनन के लिए जरूरी सभी अनुमतियों के बाद भी खनन का कार्य शुरू नहीं किया जा सका। इसकी मुख्य वजह एक बाहरी एनजीओ के संचालक आलोक शुक्ला द्वारा अपने निजी फायदे हेतु कांग्रेस पार्टी के दीपक बैज के का सहारा लेकर हसदेव बचाव के नाम पर बाहरी आदिवासियों को आगे रखकर दुष्प्रचार का खेल खेला जा रहा है। यही कारण है कि जहां छत्तीसगढ़ को करीब 500 करोड़ के राजस्व का नुकसान झेलना पड़ा है तो वहीं अब राजस्थान सरकार के बिजली घरों में कोयले की कमी को लेकर चिंता बढ़ने लगी है।देश को विकसित देश की राह में अग्रसर करने वाले इस 10 साल पुरानी पीईकेबी कोयला खदान क्षेत्र में 5000 से अधिक लोगों को आजीविका प्राप्त है। जिसे कुछ मुट्ठी भर बाहरी लोगों द्वारा कई फर्जी कहानी बना कर इसे फैलाने के लिए लाखों रुपये सोशल मीडिया पर खर्च किया जा रहा हैं। इसके द्वितीय चरण में खनन के लिए आज तक जमीन न मिल पाने से उदयपुर क्षेत्र की एक मात्र संचालित खदान को बंद कर दिया गया था। इसका खामियाजा क्षेत्रवासियों को बेरोजगार होकर, छत्तीसगढ़ राज्य को मिलने वाले करोड़ों रुपए के राजस्व के नुकसान और राजस्थान सरकार को महंगा कोयला तथा वहां की जनता को महंगी बिजली खरीदकर भुगतना पड़ रहा है।









