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रायपुर:जब कलेक्टर की नजर सड़क पर पड़ती थी, तो सड़क रातों-रात सुधर जाती थी!आज नामदार की गाड़ी गड्ढों से बचकर निकल रही थी लेकिन व्यवस्था की नींद नहीं टूट रही…आज सामने आई यह तस्वीर देखकर मन अनायास ही 36 साल पीछे, उस दौर में चला गया जब प्रशासन में “कलेक्टर” सिर्फ कुर्सी पर बैठने वाला अधिकारी नहीं, बल्कि जिले की पूरी व्यवस्था का वास्तविक कप्तान हुआ करता था।
तस्वीर में नामदार की गाड़ी चल रही है और नीचे सड़क अपनी बदहाली की पूरी कहानी खुद कह रही है। गड्ढों में भरा पानी, उखड़ी हुई सड़क और जगह-जगह बिखरी गिट्टी देखकर सवाल उठता है—क्या यही वह सड़क है, जिसकी सड़कों पर शासन-प्रशासन के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं?
मुझे आज से लगभग 36 साल पहले का वह दौर याद आता है। उस समय देवराज विरदी साहब रायपुर के कलेक्टर हुआ करते थे। वे रायपुर से बलौदाबाजार की ओर जा रहे थे। पंडरी-मोवा होते हुए वन विभाग के डिपो, यानी आज का विधानसभा चौक ही पहुंचे थे । रास्ते में सड़क की हालत देखकर उनका पारा चढ़ गया। कलेक्टर थे, तो सीधे वापस कलेक्टोरेट पहुंचे। पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों को बुलाया गया और सड़क की ऐसी क्लास लगी कि विभाग को अपनी जिम्मेदारी याद आ गई। परिणाम यह हुआ कि सड़क की मरम्मत के लिए रातों-रात काम शुरू हो गया। यही प्रशासन था।
कलेक्टर सड़क देखकर फाइल नहीं, समस्या देखते थे बाद में डीपी तिवारी, एम.के. रावत, आर.पी. मंडल और सी.के. खेतान जैसे कलेक्टरों का दौर भी देखा। इन अधिकारियों की एक खासियत थी—वे केवल कलेक्टोरेट की चारदीवारी में बैठकर जिले की समीक्षा नहीं करते थे। वे जिस सड़क से गुजरते, सड़क के साथ-साथ सरकारी योजनाओं और सरकारी कामकाज का भी प्रत्यक्ष निरीक्षण हो जाता था।
कहीं सड़क खराब मिली तो संबंधित विभाग के अधिकारी तलब।कहीं नाली की समस्या दिखी तो जिम्मेदार अधिकारी से जवाब।कहीं सरकारी योजना का काम अधूरा दिखा तो फाइल खुल गई।और सबसे महत्वपूर्ण बात—अधिकारी को यह डर रहता था कि कलेक्टर कभी भी, कहीं भी पहुंच सकता है और मौके पर सवाल पूछ सकता है। इसलिए व्यवस्था में एक अदृश्य अनुशासन था।
अधिकारी जानते थे—
“साहब को पता चल गया तो जवाब देना पड़ेगा।” आज सवाल यही है—क्या वह डर खत्म हो गया है या जवाबदेही खत्म हो गई है? तब कलेक्टर सड़क पर निकलता था, आज सड़क कलेक्टर को ढूंढती है! व्यंग्य कठोर है, लेकिन तस्वीर उससे भी ज्यादा कठोर है।
आज करोड़ों रुपये सड़कों, नालियों, विकास और सौंदर्यीकरण के नाम पर खर्च होते हैं। टेंडर होते हैं, वर्क ऑर्डर निकलते हैं, उद्घाटन होते हैं, फोटो खिंचते हैं और प्रेस विज्ञप्तियां जारी होती हैं। लेकिन बरसात आते ही वही सड़कें पूछती हैं— “हमारा विकास आखिर गया कहां?” गड्ढे दिखाई देते हैं।
जलभराव दिखाई देता है। उखड़ी सड़क दिखाई देती है। जनता की परेशानी दिखाई देती है। लेकिन जिम्मेदारी दिखाई नहीं देती!
सबसे बड़ा सवाल: कलेक्टर राजस्व का बॉस है, लेकिन जनता राजस्व विभाग से इतनी परेशान क्यों है? कलेक्टर जिले में राजस्व प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी होता है। आम आदमी की जमीन, सीमांकन, नामांतरण, बंटवारा, कब्जा, प्रमाण-पत्र और न जाने कितने काम राजस्व व्यवस्था से जुड़े हैं। लेकिन आज आम आदमी के बीच यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि राजस्व कार्यालय जाना यानी परेशानी को न्योता देना।
फाइल कहां है?किसके पास है?कब होगी?क्यों रुकी है?किससे मिलेंकिसको बताएं?यह सवाल आम आदमी वर्षों से पूछ रहा है।और विडंबना देखिए—
जिस व्यवस्था का मुखिया कलेक्टर है, उसी व्यवस्था के छोटे-से छोटे काम के लिए आम आदमी को चक्कर लगाने पड़ते हैं।
स्थिति इतनी बदल गई है कि कभी-कभी लगता है— पहले अधिकारी जनता से डरते थे कि शिकायत कलेक्टर तक पहुंच जाएगी, अब जनता डरती है कि उसकी शिकायत कहीं व्यवस्था में ही दब न जाए। असली सुधार आदेशों से नहीं, जवाबदेही से आता है ।
आज जरूरत किसी पुराने जमाने की हूबहू वापसी की नहीं है। जरूरत है उस प्रशासनिक संस्कार की, जिसमें अधिकारी अपने जिले को फाइलों से नहीं, जमीन पर उतरकर देखते थे।
कलेक्टर महीने में कुछ दिन बिना पूर्व सूचना के शहर और ग्रामीण क्षेत्रों का निरीक्षण करें। पीडब्ल्यूडी, नगर निगम, राजस्व, जल संसाधन और अन्य विभागों के काम का मौके पर सत्यापन हो। सड़क बनने के बाद उसकी गुणवत्ता की जांच हो। और सबसे जरूरी—
जिस अधिकारी के कार्यक्षेत्र में सड़क गड्ढे में तब्दील हो जाए, उससे यह पूछा जाए कि उसे इसकी जानकारी कब हुई और उसने क्या कार्रवाई की?
क्योंकि सरकारी व्यवस्था में सबसे खतरनाक बीमारी भ्रष्टाचार से भी पहले जवाबदेही का खत्म होना है। आज की तस्वीर सिर्फ एक सड़क की तस्वीर नहीं है। यह तस्वीर पूछ रही है—
क्या हमारे प्रशासन की वह आंख अब भी खुली है, जो सड़क के गड्ढे को देखकर विभाग की नींद उड़ा दे?
कभी एक कलेक्टर की नजर पड़ती थी तो रातों-रात सड़क सुधर जाती थी।
आज सड़क महीनों खराब रहती है, जनता रोज गुजरती है, अधिकारी गुजरते हैं, नेता गुजरते हैं, अफसरों की गाड़ियां गुजरती हैं… लेकिन सड़क नहीं सुधरती।
शायद फर्क सड़क में नहीं आया है।
फर्क व्यवस्था के मिजाज में आया है।
पहले कलेक्टर को देखकर विभाग सहमता था— आज लगता है, विभाग को किसी के आने-जाने से कोई फर्क ही नहीं पड़ता। और यही सबसे बड़ा खतरे का संकेत है।
( मनोज शुक्ला)





