
रायपुर:कल से जिस तरफ नजर डालो, हर सड़क पेट्रोल पंप की लाइन में बदल गई है। ऐसा लग रहा है मानो पूरा शहर किसी अदृश्य डर के साये में जी रहा हो। घरों में चर्चा सिर्फ एक ही — “जल्दी जाओ, टंकी फुल करा लो… पता नहीं बाद में पेट्रोल मिले या नहीं।”
कल रात मैं एक विवाह समारोह से लौट रहा था। रास्ते में टिकरापारा के पास पेट्रोल भरवाने गाड़ी रोकी तो दृश्य देखकर हैरान रह गया। लंबी-लंबी कतारें… लोग घंटों इंतजार कर रहे थे। सबसे ज्यादा आश्चर्य तब हुआ जब मेरे मुहल्ले के ऐसे लोग भी 35-40 लीटर पेट्रोल भरवा रहे थे जिन्हें मैंने खुद अपने गाड़ी में जीवन में कभी हजार रुपये से ज्यादा का पेट्रोल डलवाते नहीं देखा।
मैंने मजाक में पूछा — “क्या बात है, कहीं बाहर जा रहे हो क्या?”
उत्तर मिला — “बाहर नहीं… लेकिन बाद में पेट्रोल मिलेगा कि नहीं, कौन जानता है। इसलिए फुल करा रहे हैं।”
यही मानसिकता आज पूरे शहर में फैल चुकी है।
जो लोग रायपुर से महीने में एक बार भी बाहर नहीं निकलते, वे भी गाड़ियां फुल टैंक करके खड़ी कर रहे हैं। जिनकी रोज की जरूरत पांच लीटर की है, वे 40 लीटर जमा कर रहे हैं। परिणाम यह कि जिन लोगों को सच में जरूरत है, उन्हें भी घंटों लाइन में लगना पड़ रहा है।
असल समस्या पेट्रोल की कमी से ज्यादा “डर” की है। कई बार अफवाहें और आशंकाएं मिलकर ऐसा माहौल बना देती हैं कि लोग जरूरत से ज्यादा खरीदने लगते हैं। फिर वही भीड़, वही अफरा-तफरी, वही घबराहट हालात को और खराब कर देती है।
यह सिर्फ पेट्रोल का मामला नहीं है, यह हमारी सामाजिक मानसिकता का आईना भी है। जब भी किसी संकट की आशंका होती है, हम संयम खो देते हैं। जरूरत से ज्यादा संग्रह करने लगते हैं। जबकि सच यह है कि अगर हर व्यक्ति सिर्फ अपनी आवश्यकता भर ले, तो शायद किसी को परेशानी ही न हो।आज शहर में पेट्रोल पंपों पर जितनी भीड़ दिख रही है, उसमें आधी जरूरत की नहीं बल्कि “पैनिक” की लाइन है। डर इंसान से वह भी करवाता है जो सामान्य स्थिति में वह कभी नहीं करता। जरूरत जागरूकता की है, अफवाहों से बचने की है और सबसे ज्यादा संयम की है।क्योंकि कई बार संकट वास्तविकता से नहीं, बल्कि हमारे डर से पैदा होता है।







