रायपुर: शंकराचार्य आश्रम बोरिया कला में चल रहे चातुर्मास्य प्रवचन माला के क्रम में शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने श्रीमद्भागवत के प्रसंग में बताया की पापी सर्वत्र पाप ही देखता है।
कंस की बुद्धि में पाप है। वह जानता है कि वसुदेव नंद में कितनी मित्रता है जब से उसने देवकी की कन्या से यह बात सुनी है कि उसको मारने वाला पैदा हो चुका है। तब से वह सशंकित रहता है और कहता है कि देवकी के आठवें गर्भ में लड़की नहीं हो सकती है। इसलिए जब वह यह सुनेगा कि तुम्हारे पुत्र का नामकरण मैंने( गर्गाचार्य) किया है, तो वह समझ जायेगा कि यह निश्चित ही वसुदेव का पुत्र देवकीनंदन ही है।
उन्होंने कहा कुछ लोग दुनिया में ऐसे होते हैं जो अपने को और दूसरे को बुरा समझते हैं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने को बुरा समझते हैं और दूसरे को अच्छा समझते हैं कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने को सबसे अच्छा ही अच्छा समझते हैं कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अच्छे बुरे का भेद नहीं समझते सब कहीं परमात्मा का दर्शन करते हैं जिसके लिए सब कुछ बुरा ही बुरा है *वह पामर जीव है* जिसके लिए दूसरा बुरा है वह *विषयी जीव* है और जिसके लिए अपना आपा बुरा हो वह *साधक जीव* है और जिसके लिए सब कुछ अच्छा है *वह सिद्ध जीव* है जिसके लिए सब परमात्मा ही परमात्मा है, वह स्वयं परमात्मा है। अब आप अपनी ओर देखो आपकी क्या स्थिति है? जहां तुम्हारी स्थिति होगी वही तुम रहोगे इसलिए गर्गाचार्य जी कहते हैं कि कंस पापी है और उसको सर्वत्र पाप ही दीखता है। वसुदेव जी समझ गए और उन्होंने अपने दोनों पुत्रों का नामकरण संस्कार गौशाला में संपन्न कराया।
कथा के पूर्व श्रीमद्भागवत के यजमानों ने मिलकर पुराण पुरुषोत्तम भगवान की आरती संपन्न की, तथा मंगल पाठ श्री शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वानों ने संपन्न कराया।

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