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रायपुर:जगद्गुरु शंकराचार्य आश्रम बोरियाकला में चल रहे चातुर्मास प्रवचन माला क्रम को गति देते हुए श्रीमद्भागवत कथा के प्रसंग में शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉक्टर स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने बताया कि देह रूपी वृक्ष का फल सनातन धर्म है। इस शरीर का फल विषय भोग वासना नहीं है भोग और वासना की पूर्ति के लिए अनेक योनियों में जन्म प्राप्त होता है मनुष्य योनि को छोड़कर सारी की सारी योनियों भोग योनियों कहलाती हैं। केवल मनुष्य ही एक ऐसी योनि है जिससे ब्रह्म साक्षात्कार किया जा सकता है। ब्रह्मा जी ने सृष्टि के निर्माण के समय जल में चलने वाले जीवों का निर्माण किया पृथ्वी में चलने वाले जीवों का निर्माण किया तथा पानी में चलने वाले जीवों का निर्माण किया किंतु उनके मन में संतोष नहीं हुआ जब उन्हें मनुष्य का निर्माण किया तो उनको बड़ी प्रसन्नता हुई क्योंकि मनुष्य में ब्रह्म साक्षात्कार करने की बुद्धि है, अतः मनुष्य योनि को व्यर्थ नहीं खोना चाहिए। धर्म संपादन के लिए केवल परमात्मा के द्वारा यह मनुष्य जीवन जीवों को उपहार के रूप में प्राप्त हुआ है अनेकानेक जन्मों की पुण्य पुञ्जीभूत होने पर भी मनुष्य शरीर प्राप्त नहीं होता है मनुष्य शरीर तो केवल भगवान की कृपा से ही प्राप्त होता है यदि आपको भारत भूमि में मनुष्य शरीर प्राप्त हुआ है तो निश्चित ही भगवान श्रीमन्नारायण का आप पर विशेष अनुग्रह है,अतः इस मानव शरीर को व्यर्थ नहीं कमाना चाहिए अपितु धर्म के संपादन के द्वारा आत्मसाक्षात्कार कर लेना चाहिए।
कथा के पूर्व श्री शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वान गणों ने यजमान भारत भूषण शर्मा एवं उनके परिवार से भगवान की पोथी का पूजन एवं आरती संपन्न कराई तथा जगद्गुरुकुल के छात्रों ने मंगल पाठ किया ठीक है।









