
रायपुर:श्री शंकराचार्य आश्रम बोरिया कला में चल रहे चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला के प्रसंग में शिव पुराण की कथा को विस्तार देते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. स्वामी इंदुभवानन्द तीर्थ महाराज ने बताया कि भगवान शंकर का साक्षात् स्वरूप रुद्राक्ष माना जाता है। रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के नेत्रों से हुई है इसलिए रुद्राक्ष में और भगवान शिव में कहीं कोई अंतर नहीं है।
उन्होंने कहा शिव पुराण की कथा के अनुसार भगवान शंकर ने हजारों दिव्य वर्ष की तपस्या के पश्चात अपने नेत्रों को खोलने से जो अश्रुपात् हुआ उस अश्रुपाद की बूंद गिरने से रुद्राक्ष की उत्पत्ति हुई है। एक अन्य कथा के अनुसार भगवान शंकर ने त्रिपुरासुर का वध करना चाहा तो उन्होंने एक सहस्त्र दिव्य वर्ष तक तपस्या की और उनकी आंख से जो अश्रुपाद हुआ उसी से रुद्राक्ष की उत्पत्ति हुई है। रुद्राक्ष चार वर्ण का होता है श्वेत रक्त पीत और कृष्ण वर्ण के अनुसार भी रुद्राक्ष धारण करने की परंपरा है। ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र को अलग-अलग वर्णन के रुद्राक्ष पहनने का शास्त्र में वर्णन प्राप्त होता है। शास्त्रों के अनुसार रुद्राक्ष 1 से 14 मुख होता है। विभिन्न प्रकार की कामनाओं को लेकर अलग-अलग रुद्राक्ष को धारण करने का शास्त्रों में उल्लेख प्राप्त होता है। रुद्राक्ष में दो भेद होते हैं रुद्राक्ष और भद्राक्ष रुद्राक्ष के मध्य में भद्राक्ष मिलाकर धारण करने से बड़ा लाभ होता है जिस रुद्राक्ष में स्वयं छिद्र होता है, वह उत्तम माना जाता है और जिस रुद्राक्ष में छेद किया जाता है वह मध्यम माना जाता है। भोग और मोक्ष की इच्छा रखने वालों चारों वर्णों को रुद्राक्ष पहनना चाहिए विशेष कर भगवान शिव और माता पार्वती जी की प्रसन्नता के लिए शिव भक्तों को रुद्राक्ष अवश्य पहनना चाहिए। अवल के फल के बराबर जो रुद्राक्ष हो वह श्रेष्ठ बताया गया है जो रुद्राक्ष बर के फल के बराबर हो उसे मध्यम श्रेणी का माना गया है और जो रुद्राक्ष चने के बराबर हो उसकी गणना निम्न कोटि में की जाती है। जो रुद्राक्ष आंवले के फल के बराबर होता है वह समस्त प्रकार के अरिष्टों का विनाश करने वाला होता है। शिव भक्तों को रुद्राक्ष की माला भी अवश्य पहनना चाहिए। रुद्राक्ष की माला में समस्त देवताओं का जाप करने का विधान प्राप्त होता है। कथा के पूर्व समस्त श्रोताओं ने शिव पुराण की पोथी का पूजन किया तत्पश्चात जगद्गुरु कुलम् के छात्रों ने मंगलाचरण किया।








