
रायपुर: शंकराचार्य आश्रम बोरियाकला में चल रहे चातुर्मास्य प्रवचन माला के क्रम को गति देते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने राजा ययाति के प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए बताया कि विषय भोग के द्वारा कामना की शांति कभी नहीं होती है। काम मन को बारंबार घायल करता रहता है। अग्नि में जितनी भी आहुति डालो आग उतनी ही बढ़ती जाती है इसी प्रकार इन इंद्रियों को जितना भी विषय भोग दिया जाए उतना ही बढ़ती जाती है। अतः इंद्रियों का दमन करना ही काम पर नियंत्रण का एकमात्र सहारा हो सकता है। जब मनुष्य किसी प्राणी के लिए अमंगल की कामना नहीं करता है सुंदर समदर्शी हो जाता है तब उसके लिए सब दिशाएं सुखमय हो जाती हैं, लेकिन तृष्णा ऐसा रोग है कि दुर्बुद्धि लोग भी उसको छोड़ना नहीं चाहते हैं। मनुष्य के बूढ़े होने से उसकी तृष्णा कभी बूढी नहीं होती है, इस तृष्णा को छोड़े बिना दुख कभी नहीं छूटता है। शांति के लिए तृष्णा का परित्याग करना अत्यंत आवश्यक है। मनुष्य को अपनी इंद्रियों पर कदापि विश्वास नहीं करना चाहिए मनुष्य का इंद्रिय ग्राम बड़ा बलवान है बड़े से बड़े विद्वान पंडितों को भी वह अपनी ओर खींच लेता है। राजा ययाति कहते हैं कि मुझे विषयों की सेवा करते करते हजारों वर्ष व्यतीत हो गए लेकिन फिर भी मेरी तृष्णा बढ़ती ही जा रही है इसलिए अब मैं अपने मन को परमात्मा में लगाकर निर्द्वन्द्व निरहंकार होकर विचरण करूंगा। मुझे मनुष्यों और स्त्री पुरुषों के मध्य में रहने की रुचि नहीं रही है। क्योंकि मनुष्यों में कुछ न कुछ ममता संबंध और आसक्ति का उदय हो ही जाता है।अतः विषयों का ना चिंतन करना चाहिए और न भोग करना चाहिए क्योंकि यदि इसके चिंतन और भोग में मन लग जाएगा तो जन्म पर जन्म होते ही रहेंगे और हम आत्मज्ञान से वंचित हो जाएंगे। जो विरक्त होता है वही आत्मदर्शी होता है।







