
रायपुर:शंकराचार्य आश्रम बोरियाकला में चल रहे चातुर्मास प्रवचन माला क्रम मे शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने भागवत धर्म का उपदेश करते हुए बताया कि भगवद् अर्पण बुद्धि पूर्वक किया गया कर्म ही भागवत धर्म कहलाता है। नव योगीश्वर संवाद की व्याख्या के प्रसंग में नारद जी भगवान श्री कृष्ण के माता-पिता वसुदेव देवकी को ज्ञान देने के लिए जब उनके महल में पहुंचे तो उन्होंने नवयोगीश्वर का संवाद प्रारंभ किया और बताया कि भगवान के लिए चाहे कोई भी काम करें, शरीर से, वाणी से, मन से, इंद्रियों से, बुद्धि से, अहंकार से अथवा आदत से वह सब परमब्रह्म परमात्मा को नारायण को यदि समर्पित कर देता है तो इतने करने मात्र से उसे भागवत धर्म का पुण्य प्राप्त हो जाता है। नव योगीश्वर सर्वत्र सर्वदा सब में भगवत दर्शन करते हुये विचरण करते हैं। सर्वत्र सर्वदा सब में भगवान का दर्शन करना ही भागवत धर्म है। अतः सर्वदा असंग रहना ही भक्ति का लक्षण होता है। संसार के प्राणी असतद्वस्तु में आत्मभाव होने के कारण दुखी हैं उनकी बुद्धि सदा उद्विग्न रहती है अतः भगवान के चरणारविंद का भजन करें तो निर्भय हो जाएंगे। भगवान के चरणारविंद की सेवा परम कल्याण का कारण है। इस प्रकार नव योगेश्वर राजा निमि को उपदेश दे रहे हैं। इसी दृष्टांत का आधार करके नारद जी ने देवकी एवं वसुदेव को भगवान की आज्ञा मानकर ब्रह्म ज्ञान का उपदेश दिया। वसुदेव देवकी का भगवान श्री कृष्णा में पुत्र भाव था इसलिए भगवान श्री कृष्ण के उपदेश का उन पर कोई प्रभाव नहीं होता था अतः भगवान श्री कृष्ण ने वसुदेव देवकी की मुक्ति के लिए नारद जी को ब्रह्म ज्ञान देने का आदेश दिया था। नारद जी ने भगवान की आज्ञा को शिरोधार्य करके वसुदेव देवकी को ब्रह्म ज्ञान देकर के मुक्त कर दिया।
कथा के पूर्व शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वान गण ने एवं जगद्गुरुकुल के छात्रों ने पोथी का पूजन कर आरती संपन्न कराई।






