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रायपुर: शंकराचार्य आश्रम में चल रहे चातुर्मास प्रवचन माला के क्रम को गति देते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने शिव पुराण कथा की मार्मिक व्याख्या करते हुए बताया कि “कृतघ्न के लिए शास्त्र में कोई प्रायश्चित का विधान नहीं है।” समस्त देवता त्रिपुरासुर के भय आक्रांत होकर के भगवान शिव की शरण में गए भगवान शिव ने कहा कि ब्रह्म हत्या करने वाला, सुरा पान करने वाला, स्वर्ण की चोरी करने वाला तथा व्रत भंग करने वाला इन सभी के लिए शास्त्रकारों ने प्रायश्चित बताया है किंतु कृतघ्न के लिए कोई प्रायश्चित नहीं बताया गया। हे देवताओं! आप लोग धर्म के मर्मज्ञ हो धर्मपूर्वक विचार करके बताएं कि वह दैत्य मेरे भक्त हैं तब मैं उसका वध किस प्रकार कर सकता हूं ? युद्ध में अजेय होते हुए भी मैं जानबूझकर किस प्रकार मित्र द्रोह का आचरण करूं क्योंकि ब्रह्मा जी ने पहले ही कहा है कि मित्र द्रोह करने में महान पाप होता है। इस समय त्रिपुराध्यक्ष पुण्यवान है जिसमें पुण्यनिवास करता है उसे विद्वानों को कभी नहीं मारना चाहिए। मैं देवताओं के समस्त कष्ट को जानता हूं,वे दैत्य इस समय प्रबल हैं देवता अथवा असुर उन्हें कोई मारने में समर्थ नहीं है। और फिर वे दैत्य मेरे भक्त हैं। हे देवताओं! जब तक वे मुझ में भक्ति रखते हैं तब तक मैं उन्हें नहीं मार सकता हूं, तथापि आप लोग भगवान विष्णु से बात करके “इस कारण” को बताइए।
भगवान विष्णु ने कहा कि यह बात सत्य है कि जहां सनातन धर्म विद्यमान होता है वहां दुख उसी प्रकार से नहीं होता है जिस प्रकार सूर्य के रहते हुए अंधकार नहीं होता है।
कथा के पूर्व श्री शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वानों ने भगवान शिव की पूजन करके आरती की तथा जगतगुरु कुलम के छात्रों ने वैदिक मन्त्रों का पाठ किया।










