रायपुर: शंकराचार्य आश्रम बोरिया कला में चल रहे चातुर्मास प्रवचनमाला के क्रम को गति देते हुए शिव पुराण की कथा के अंतर्गत गणेश कार्तिकेय विवाह प्रसंग के संदर्भ में शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने बताया कि पुत्र के लिए माता-पिता के चरण कमल ही महान तीर्थ हैं। अन्य तीर्थ तो दूर जाने पर प्राप्त होते है। स्नान ,अवगाहन व मञ्जन करने पर फल प्रदान करते हैं किंतु माता-पिता के चरण अत्यंत सन्निकट रहते हैं सभी प्रकार से सुलभ होते हैं। और सभी धर्म का साधन माने जाते हैं पुत्र के लिए घर में ही यदि कोई सर्वोत्तम तीर्थ है तो माता-पिता के चरण कमल ही है। वेद शास्त्रों का यही कहना है। आप लोगों को भी यही करना चाहिए अन्यथा यह असत्य हो जाएंगे और आपका स्वरूप भी मिथ्या सिद्ध हो जाएगा और तब वेद शास्त्र भी मिथ्या सिद्ध हो जाएंगे।
गणेश जी ने अपने माता-पिता शिव एवं पार्वती की आसन पर बैठाकर सात परिक्रमा करने के पश्चात उक्त बातें कहीं। उन्होंने कहा की माता-पिता की परिक्रमा करने से सारी पृथ्वी की परिक्रमा का पुण्य प्राप्त हो जाता है तथा पृथ्वी में स्थित सभी तीर्थ में स्नान करने का भी पुण्य प्राप्त हो जाता है ऐसा धर्म शास्त्रों का निर्देश प्राप्त होता है। अतः मेरा विवाह कर दिया जाए।
पार्वती परमेश्वर पुत्र गणेश की विलक्षण बात सुनकर के आश्चर्यचकित रह गए। माता पार्वती पुत्र की प्रशंसा करते हुए बोली जिसके पास बुद्धि है उसी के पास वल है बुद्धिहीन को बोल कहां से प्राप्त होगा? बुद्धि के बल से खरगोश ने मदमस्त सिंह को कुएं में गिरा दिया था। हम दोनों ने तुम्हारी बात मान ली है अब उसे अन्यथा नहीं किया जा सकता है ऐसा कहकर पार्वती परमेश्वर ने बुद्धि सागर गणेश को आश्वस्त कर उनका विवाह करने के लिए तैयार हो गए।
कथा के पूर्व शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वानों ने पुराण पुरुषोत्तम भगवान की पोथी का पूजन कर आरती की तथा जगद्गुरुकुल कुलम् के छात्रों ने वेद पाठ किया।

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