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रायपुर:राजधानी के शंकराचार्य आश्रम में चल रहे चातुर्मास प्रवचन माला के क्रम को गति देते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने शिव पुराण की कथा को आधार करते हुए बताया कि भगवान शिव ने लोक कल्याण के लिए जहर को ना निगला और उगला। उन्होंने कहा समस्त देवता तारकासुर की पीड़ा से मुक्त होने के लिए भगवान शिव की कैलाश में सम्मिलित होकर के स्तुति कर रहे हैं। भगवान शिव पराम्बा भगवती के साथ देवमान की दृष्टि से 1000 वर्ष तक श्रृंगार भाव से युक्त थे। देवताओं ने भगवान से प्रार्थना करते हुए कहा कि आप बड़े कृपालु दयालु हैं। देवताओं की रक्षा आपने सदा सर्वदा की है। हम आपके उपकार के आज भी ऋणी हैं जिस समय समुद्र से कालकूट नामक विष निकला था, उसे देखकर देवता भाग खड़े हुए उसे आपने ही पान किया किंतु उसे न पेट में रखा और न जिह्वा में रखा अर्थात ना उगला और ना निगला क्योंकि उगलने और निगलने दोनों स्थिति में जीवो को कष्ट था निगलने में उदरस्थ जीवों को उगलने में प्रकृतिस्थ जीवों को वह कालकूट जहर पीड़ित करता अतः अंतस्थ और प्रकृतिस्थ जीवो के कल्याण के लिए आपने उसे कालकूट जहर को अपने कंठ में ही धारण कर लिया इसलिए आप नीलकंठ के नाम से विख्यात हुए। यह आपकी सबसे बड़ी दयालुता है महाराज हम आपकी शरण में पड़े हैं अब भी आप कृपा कीजिए तारकासुर से मुक्ति के लिए हमें अभय वरदान दीजिए।
डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने कहा जब तक आपकी कृपा नहीं होगी तब तक हम अपने खोए हुए राज्य एवं वैभव को प्राप्त नहीं कर सकते अतः आपसे बार-बार निवेदन है कि तारकासुर के आतंक से मुक्त करने की कृपा की कीजिए।कथा के पूर्व शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वानों ने श्रावणी के उपलक्ष में विधिवत उपाकर्म संपन्न कराया तथा भगवान शिव के पूजन के पश्चात कथा प्रारंभ हुई।कथा के प्रसंग में स्वामी जी ने रक्षाबंधन के महत्व को भी प्रकाशित करते हुए वलि वामन की कथा सुनाई।









