रायपुर:राजधानी के।शंकराचार्य आश्रम में चातुर्मास प्रवचन माला के क्रम में शिव पुराण की कथा प्रसंग पर बोलते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ जी महाराज ने कहा कि भगवान शंकर के त्रिशूल के दर्शन करने मात्र से तीनों शूल व्यक्ति के नष्ट हो जाते हैं। इन तीन शूलों को त्रयताप दोष कहा जाता है। आध्यात्मिक ताप, आधिभौतिक ताप आधि दैविक ताप इन्हीं तीन तापों को तीन शूल कहा गया है। इन्हीं तीनों शूलों के कारण व्यक्ति को बार-बार जन्म मृत्यु के चक्कर में आना पड़ता है ये तीनों शूल भगवान शिव के त्रिशूल के दर्शन मात्र से नष्ट हो जाते है। उन्होंने कहा शरीर,बुद्धि,इंद्रिय और मन की पीड़ा को आध्यात्मिक ताप कहते हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश पंचभूतों से प्राप्त होने वाले दुख को आधिभौतिक ताप कहते हैं तथा ग्रहों से एवं देवताओं से जो कष्ट प्राप्त होता है वह आधि दैविक ताप कहलाता है। यही तीन ताप तीन शूल कहलाते हैं जो भगवान शिव के त्रिशूल के दर्शन करने मात्र से नष्ट हो जाते हैं।
डॉ.स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज नेसुधिवक्ता भगवान शिव की बारात का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान शिव का श्रृंगार भगवान शिव के गण ही कर रहे थे अन्य देवों को श्रृंगार करने का अधिकार ही नहीं था। भगवान शिव का बड़ा विचित्र श्रृंगार और बड़ी विचित्र बारात देखकर के भगवान विष्णु ने व्यंग्य करते हुए कहा कि वर(दुल्हा) के अनुकूल बारात नहीं है अतः हम लोगों को भगवान शिव की बारात से अलग चलना चाहिए। उन्होंने कहा भगवान शिव अपने गणों के साथ तथा भगवान विष्णु समस्त देवताओं के साथ बारात में चल रहे थे। देवांगना है बारात देकर देख करके विस्मित और चकित हो रही थी और मन में विचार कर रही थी की दूल्हा के अनुरूप संसार में कोई दुल्हन नहीं है।
कथा के पूर्व कथा के यजमान परम साहू, मनोरमा साहू एवं उनके परिवार ने भगवान शिव का पूजन करके आरती की , शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वानों ने कर्मकांड भाग को संपन्न कराया।









