रायपुर:राजधानी के शंकराचार्य आश्रम में चल रहे चातुर्मास मास को गति देते हुए शिव पुराण की कथा का तात्विक विवेचन करते हुए श्री शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने बताया कि दुष्ट की विद्या विवाद के लिए धन मद के लिए एवं शक्ति दूसरों को पीड़ित करने के लिए होती है, इसके ठीक विपरीत साधु की विद्या ज्ञान के लिए धन दान के लिए तथा शक्ति दूसरों की सेवा करने के लिए होती है यही अंतर साधु व दुष्ट में होता है। दक्ष के द्वारा किया गया शिवजी के अपमान को रेखांकित करते हुए महाराज ने कहा की दक्ष के पास जब ब्रह्मा जी के द्वारा बड़ा पद प्रजापति का प्राप्त हुआ तो सर्वप्रथम उन्होंने भगवान शिव का अपमान करने के लिए ही यज्ञ का आयोजन किया।
स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने कहा दुष्ट की विद्या दुष्ट का धन और दुष्ट की शक्ति ही सज्जनों को पीड़ित करने के लिए होती है। भगवान शंकर यज्ञ के देवता हैं जब तक भगवान की कृपा नहीं होती है तब तक कोई यज्ञ फलवान नहीं होता है यज्ञ के फल के रूप में भगवान स्वयं शिव यज्ञ के “अपूर्व” रूप में विराजमान होते हैं तभी यज्ञ फलवान होता है दुष्ट दक्ष भगवान शिव के अपमान के लिए यज्ञ का आयोजन कर रहा है शिव विरोध से कभी यज्ञ सफल नहीं होता है, वह तामसी यज्ञ माना जाता है अतःदक्ष का यज्ञ भी भगवान शंकर ने विध्वंस कर दिया
कथा के यजमान पुहुपराम साहू एवं मनोरमा साहू ने भगवान शिव की विधिवत पूजन शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वानों के द्वारा संपन्न कराई। तत्पश्चात महाराज श्री ने कथा सुनाएं।








