रायपुर:राजधानी के शंकराचार्य आश्रम बोरियाकला में श्री चातुर्मास प्रवचन माला के अंतर्गत शिव पुराण की दिव्य अमृतमयी कथा का विस्तार करते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने बताया कि शिव पुराण संहिता है। संहिता का अर्थ होता है जो मनुष्य के हित की बात करें,वह संहिता कहलाती है। जीव के कल्याण की बात जिसमें निहित होती है, उसको संहिता कहते संहिता साक्षात् वेद का ही स्वरूप मानी जाती है वेद का अनुगमन करने वाले शास्त्र संहिता कहलाते इसलिए संस्कृत में उसकी व्याख्या करते हुए बताया गया है कि सम्यक हित जिसमें छिपा हो वह संहिता होती है सम्यक् हित की बात केवल वेद ही करता है, वेद ही मनुष्य के कल्याण की बात करता है जीव का परम लक्ष्य परमात्मा से मिलना है। जीव की यात्रा तब तक चलती रहती है जब तक उसे परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती है, परमात्मा की प्राप्ति ही जीव का मूलभूत लक्ष्य है उसे लक्ष्य की प्रति मनुष्य योनि में होती है। इस प्रकार का उपदेश जिन शास्त्रों में निहित होता है उसको संहिता कहते हैं इसलिए शिव पुराण भी संहिता है भगवान शंकर ने स्वयं शिव पुराण की कथा सर्वप्रथम सनतकुमारों को सुनाई थी भगवान शिव दक्षिणामूर्ति के रूप में एक वटवृक्ष के नीचे विराजमान हुए और मौन व्याख्यान के रूप में शिष्यों को आत्मबोध करा रहे थे। इस ग्रंथ का नाम शिव पुराण है अतः शिव पुराण की कथा सर्वप्रथम शिव जी के द्वारा सनकादियों ने ही श्रवण की थी।सुधि वक्ता ने आगे कथा का विस्तार करते हुए बताया कि बिन्दुग जैसे निकृष्ट पापी और चंचुला जैसी कुमार्गामी स्त्री भी भगवान शिव की कथा सुनकर मुक्त हो गए अतः बड़े से बड़ा पापी भी भगवान शिव की शरण लेता है, उनकी कथा सुनता है तो पाप से मुक्त हो जाता है। भगवान शंकर जैसा दयाल कोई भी देवता नहीं है इसलिए समस्त देव ,यक्ष, नाग किन्नर, गंधर्व वा मनुष्य भगवान शंकर की शरण ग्रहण करते हैं भगवान शंकर सबको उनके मनोनुकूल इच्छाओं को पूर्ण करते हैं, और अंत में अपने स्वरूप को देखकर अपना पार्षद बनाकर शिवलोक में रखते हैं।कथा के शंकराचार्य आश्रम के आचार्यों ने वेदों का मंगलाचरण किया तथा आरती करके पोथी का पूजन किया तत्पश्चात सभी श्रोताओं को स्वामी जी महाराज ने शिव पुराण की दिव्य अमृतमयी कथा सुनाई।

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