रायपुर: विनोद जी का गोलोकगमन के बाद से प्रतिपल उनका ही विचार मन मस्तिष्क में समाया रहा उनके कृतियों को एक नज़र डालने से अनायास ही शब्दों का संयोजन जो हुआ वह आप सब के साथ साझा कर रहा हूं..
विनोद जी ने “आकाश की तरफ़ चाबी का गुच्छा उछाला तो आसमान खुल गया,जरूर उनकी कोई चाबी आसमान में लग गई”और विनोद जी चले गए “नया गरम कोट पहन कर विचार की तरह”सब कुछ होना बचा रहेगा, अतिरिक्त नहीं….
#आकाश से धरती को खटखटाएंगे #…
महाविद्यालय, पेड़ पर कमरा, गमले में जंगल, नौकर की कमीज़, दीवार में एक खिड़की, हरी घास की छप्पर वाली झोपडी और बौना पहाड़ ये सब ढूंढेंगे….
तब हम में से हरेक #बादल क्या खायेगा की चिंता में रत उनसे कहीं ना कहीं टकराएंगे तो फिर चर्चा होगी कि “पेड़ नहीं बैठता”घर में ताला लगाते हैं तो घर को कहां कैद करते हैं घर जहां रहता है वहीं रहता है घर खुला रहता है तो भी जाता नहीं और रहा आता है कि रहना ढूंढना न पड़े इसीलिए एक जगह ठिकाना रहता है, इस पर भी चर्चा अवश्य होगी कि..#आप कहीं जा नहीं सकते यह सोचने वाला कैदी हो जाता है.
(विवेक शुक्ला की कलम से)








