रायपुर : आम बीमाधारकोंं तथा ट्रेड यूनियनों के भारी विरोध के बावजूद देश की जनता की घरेलू बचत को विदेशी पूंजी के हवाले करने बीमा क्षेत्र में 100% एफ डी आई वृद्धि के केंद्र सरकार के मनमाना निर्णय का तीव्र विरोध करते हुए वित्तीय क्षेत्रों की अधिकारी कर्मचारी यूनियनों की संयुक्त संघर्ष समिति के राष्ट्रव्यापी आव्हान पर आज प्रदेश भर में बैंक व बीमा कर्मचारियों व अधिकारियों ने जबर्दस्त विरोध प्रदर्शन आयोजित किया । राजधानी रायपुर में मुख्य प्रदर्शन एल आई सी के पंडरी स्थित मंडल कार्यालय के समक्ष किया गया। शाम को बड़ी संख्या में उपस्थित लोगों ने मानव श्रृंखला का निर्माण किया और हर कीमत पर इस प्रस्ताव के वापसी तक संघर्ष जारी रखने का संकल्प लेकर विरोध सभा की ।
आज के विरोध दिवस का आव्हान ऑल इंडिया बैंक एम्प्लॉईज़ एसोसिएशन (AIBEA),ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कॉन्फेडरेशन (AIBOC ) ,नेशनल कॉन्फेडरेशन ऑफ बैंक एम्प्लॉईज़ (NCBE),फेडरेशन ऑफ एल आई सी क्लास वन ऑफिसर्स एसोसिएशन (LIC Class I Off. fed.), ऑल इंडिया इंश्योरेंस एम्प्लॉईज़ एसोसिएशन (AIIEA),जनरल इंश्योरेंस एम्प्लॉईज़ ऑल इंडिया एसोसिएशन (GIEAIA),ऑल इंडिया एल आई सी एम्प्लॉईज़ फेडरेशन (AILICEF),ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन(AIBOA ),बैंक एम्प्लॉईज़ फेडरेशन ऑफ इंडिया (BEFI) द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था। सभा को बैंक अधिकारी संघ के नेता वाय गोपाल राव, बैंक कर्मचारी संघ से शिरीष नलगुंडवार, राज्य कर्मचारी संघ से चंद्रशेखर तिवारी,प्रायवेट स्कूल शिक्षक संघ (सीटू) से राजेश अवस्थी एवं सेंट्रल जोन इंश्योरेन्स एम्पलाइज एसोसिएशन के महासचिव धर्मराज महापात्र एवं ने संबोधित किया। इस अवसर पर संपन्न विरोध सभा को संबोधित करते हुए नेताओं ने कहा कि वर्तमान सरकार की पुरानी आदत के अनुसार, एक बार फिर लोहे की मुट्ठी पर मख़मली दस्ताना चढ़ाया गया है। जनहितैषी भाषा और शब्दावली का उपयोग कर एक ऐसी नीति को वैध ठहराने की कोशिश की गई है, जो वास्तव में जनहित को कमजोर करती है।
लोकसभा में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत इस विधेयक को चालाकी से “सबका बीमा – सबकी रक्षा (बीमा क़ानूनों का संशोधन) विधेयक 2025” नाम दिया गया है। संशोधनों के घोषित उद्देश्य बीमा क्षेत्र की वृद्धि को तेज करना, पॉलिसीधारकों की सुरक्षा बढ़ाना, कारोबार करने में सुगमता लाना तथा विनियामक पारदर्शिता और निगरानी को मजबूत करना बताए गए हैं। किंतु वास्तविक मंशा कहीं अधिक घातक प्रतीत होती है—यह भारत की बहुमूल्य घरेलू बचत को थाली में परोसकर विदेशी पूंजी के हवाले करने का प्रयास है।उन्होंने कहा कि प्रस्तुत विधेयक भारतीय बीमा कंपनियों में, पोर्टफोलियो निवेशकों सहित, 100 प्रतिशत तक विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति देने का प्रस्ताव करता है। कहा जा रहा है कि इससे पूंजी, तकनीक और वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ आएँगी। किंतु 100 प्रतिशत FDI से न तो भारतीय अर्थव्यवस्था को लाभ होगा और न ही बीमाधारकों को। इससे केवल इतना होगा कि विदेशी पूंजी को देश की घरेलू बचत तक अधिक पहुँच और नियंत्रण मिल जाएगा। यह सर्वविदित है कि किसी भी अर्थव्यवस्था के विकास में घरेलू बचत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। एक कल्याणकारी राज्य के रूप में भारत को अपने संवैधानिक दायित्वों को पूरा करने के लिए घरेलू बचत पर अधिक नियंत्रण बनाए रखना चाहिए।लगभग सभी प्रमुख विदेशी बीमा कंपनियाँ पहले से ही घरेलू बीमाकर्ताओं के साथ साझेदारी में भारत में कार्यरत हैं। वर्तमान में 74 प्रतिशत की FDI सीमा निजी क्षेत्र के विकास या विस्तार में कोई बाधा नहीं है। वास्तव में, वित्त राज्य मंत्री श्री पंकज चौधरी ने 3 दिसंबर 2024 को राज्यसभा में पूछे गए अतारांकित प्रश्न संख्या 877 के उत्तर में बताया था कि 31 मार्च 2024 तक बीमा उद्योग में विदेशी इक्विटी का स्तर ₹31,365.57 करोड़ है, जो अनुमेय 74 प्रतिशत सीमा के मुकाबले केवल 32.67 प्रतिशत है।FDI सीमा को 74 प्रतिशत तक बढ़ाए जाने के बाद से जीवन बीमा क्षेत्र में केवल चार कंपनियों—फ्यूचर जेनराली लाइफ, एजियास, एविवा और क्रेडिट एक्सेस लाइफ इंश्योरेंस कंपनी—ने ही इस सीमा का उपयोग किया है। IRDAI की वार्षिक रिपोर्ट 2023–24 के अनुसार एको लाइफ, बंधन लाइफ, भारती एक्सा लाइफ, कोटक महिंद्रा इंश्योरेंस, मैक्स लाइफ और सहारा इंडिया लाइफ जैसी कई बड़ी कंपनियों में कोई भी विदेशी इक्विटी नहीं है।इसके अतिरिक्त, FDI को 100 प्रतिशत तक बढ़ाने से बीमा उद्योग में गंभीर अव्यवस्था उत्पन्न होगी। यदि विदेशी साझेदार संयुक्त उपक्रमों से हटकर स्वतंत्र रूप से व्यवसाय चलाने का निर्णय लेते हैं, तो घरेलू कंपनियों पर इसका विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा। यह उल्लेखनीय है कि अब तक नौ विदेशी बीमाकर्ता भारतीय बीमा बाज़ार से बाहर निकल चुके हैं, जिससे पॉलिसीधारक असमंजस की स्थिति में रह गए।यह एक तथ्य है कि विदेशी पूंजी अधिक मुनाफे की तलाश में आती है। ऐसे में उनका लक्ष्य उच्च आय वर्ग के ग्राहक और सबसे अधिक लाभदायक कारोबार होगा, जैसा कि पूर्णतः विदेशी स्वामित्व वाले बैंकों के मामले में देखा गया है। ऐसी स्थिति घरेलू बीमाकर्ताओं को भी केवल मुनाफे वाले कारोबार के लिए प्रतिस्पर्धा करने को मजबूर कर देगी, जिससे निम्न-मध्यम वर्ग और समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों की बीमा आवश्यकताओं की उपेक्षा होगी। इसलिए 74 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत FDI की अनुमति देने का कोई औचित्य नहीं है।
घरेलू बचत पर विदेशी पूंजी को अधिक नियंत्रण देना अत्यंत अविवेकपूर्ण होगा, विशेषकर तब जब अर्थव्यवस्था टैरिफ युद्धों और भारी पूंजी निकासी के कारण अनिश्चितता का सामना कर रही है। RBI की रिपोर्टों के अनुसार हाल के वर्षों में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी अत्यंत नगण्य रहा है।इसके अलावा यह मान लेना कि अधिक FDI से स्वतः बीमा पैठ (इंश्योरेंस पेनिट्रेशन) बढ़ जाएगी, एक भ्रम है। जीवन बीमा पैठ मुख्यतः लोगों की प्रयोज्य आय पर निर्भर करती है, जबकि सामान्य बीमा पैठ किसी देश में संपत्ति स्वामित्व के स्तर पर निर्भर करती है। इन दोनों ही मामलों में, सरकार के दावों के बावजूद, भारत की स्थिति निम्न स्तर पर है। इसके बावजूद LIC और सार्वजनिक क्षेत्र की सामान्य बीमा कंपनियों ने कठिन आर्थिक परिस्थितियों में भी ऐसा प्रदर्शन किया है कि भारत की बीमा पैठ विकसित देशों के बराबर दिखाई देती है। सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र को मजबूत करना चाहिए, न कि कमजोर।दुर्भाग्यवश, LIC अधिनियम की धारा 30A और 43 में संशोधन कर बीमा अधिनियम, 1938 को LIC पर और अधिक पूर्ण रूप से लागू करने का प्रस्ताव किया गया है। इससे LIC को निजी बीमाकर्ताओं के और अधिक समकक्ष बना दिया जाएगा। इससे यह आशंका पैदा होती है कि LIC का विशिष्ट सामाजिक सुरक्षा दायित्व और कर्मचारियों की रोजगार सुरक्षा को व्यावसायिक मापदंडों के अधीन कर दिया जाएगा। रायपुर डिवीजन इंश्योरेंस एम्पलाइज यूनियन के महासचिव सुरेन्द्र शर्मा द्वारा प्रस्तुत आभार प्रदर्शन के साथ सभा की कार्यवाही समाप्त हुई ।









