रायपुर:धुरंधर वास्तव में सिनेमा के परदे पर आर्थिक आतंकवाद और ‘खनानी’ एक चेहरा है।
अब तक भारतीय सिनेमा में आतंकवाद को अक्सर बंदूक, बारूद और सीमापार ट्रेनिंग कैंप्स के ज़रिये दिखाया गया है। लेकिन फ़िल्म “धुरंधर” इस पारंपरिक छवि को तोड़ती है। यह फिल्म उस अदृश्य युद्ध की ओर इशारा करती है, जहाँ आतंक का सबसे घातक हथियार नकली मुद्रा, हवाला और वित्तीय नेटवर्क होते हैं।
इसी संदर्भ में फ़िल्म का सबसे महत्वपूर्ण और कम चर्चित किरदार है — खनानी।
खनानी : एक किरदार या एक सिस्टम?
फ़िल्म में खनानी एक कराची-आधारित व्यापारी के रूप में दिखाया गया है, जो बाहर से वैध व्यवसायी लगता है, लेकिन अंदर से नकली करेंसी, हवाला और आतंकी फंडिंग का मास्टरमाइंड है। वह न सिर्फ़ आतंकियों को पैसा मुहैया कराता है, बल्कि राजनीतिक संरक्षण, अंतरराष्ट्रीय रूट्स और ISI जैसे संस्थागत समर्थन का भी हिस्सा है।सिनेमा की भाषा में यह एक किरदार है,लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञों की नज़र में यह एक पूरे ecosystem का प्रतिनिधित्व करता है।यह एक फिल्म नहीं हकीकत है जिसके हो प्रेरणा खुले स्रोतों और खुफिया विश्लेषणों में यह बात स्थापित है कि: पाकिस्तान में ऐसे कई फाइनेंशियल हैंडलर्स रहे हैं जो
LeT, JeM जैसे आतंकी संगठनों
अंडरवर्ल्ड नेटवर्क ,हवाला चैनलों
और FICN (Fake Indian Currency Notes)
को एक साथ संचालित करते थे।“खनानी” को किसी एक व्यक्ति से जोड़ना कठिन है, लेकिन यह किरदार उन पाकिस्तानी आतंकी फाइनेंसरों काcomposite प्रतीत होता है, जिन्होंने वर्षों तक भारत-विरोधी आतंक को आर्थिक ईंधन दिया।
नकली करेंसी : आतंक का सबसे शांत हथियार।
फ़िल्म का सबसे सशक्त पक्ष है — नकली मुद्रा का चित्रण।2012 से 2016 के बीच भारत में पकड़ी गई उच्च गुणवत्ता वाली FICN ने सुरक्षा एजेंसियों को गंभीर चिंता में डाला था। ये नोट:असली जैसे दिखते थे अंतरराष्ट्रीय रूट्स (कराची–दुबई–काठमांडू–ढाका) से भारत पहुंचते थेआतंकवाद, ड्रग्स और अंडरवर्ल्ड को फंड करते थे।धुरंधर में खनानी इसी नेटवर्क का चेहरा है — वह व्यक्ति जो बिना गोली चलाए, बिना सीमा पार किए, भारत की आंतरिक सुरक्षा को खोखला कर रहा था।
नोटबंदी : फिल्म और वास्तविकता का संगम फ़िल्म संकेत देती है कि अचानक आए एक बड़े फैसले ने इस पूरे नकली करेंसी नेटवर्क की कमर तोड़ दी। वास्तविकता में भी, 8 नवंबर 2016 की नोटबंदी के बाद:पुराने ₹500 और ₹1000 के नकली नोट बेकार हो गए,कैश आधारित हवाला नेटवर्क को तत्काल झटका लगा.आतंकी फंडिंग के कई रूट्स अस्थायी रूप से ठप हो गए।हालाँकि यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि आतंक पूरी तरह खत्म हो गया, लेकिन यह निर्विवाद है कि आर्थिक आतंकवाद को एक गहरी चोट पहुँची।
खनानी की रहस्यमयी मौत भी नोटबंदी के कारण ही हुआ था। सिनेमा बनाम सच फ़िल्म में खनानी का अंत रहस्य में डूबा हुआ है — न पूरी तरह हत्या, न आत्महत्या, न दुर्घटना। हकीकत में भी कई ऐसे फाइनेंसर रहे हैं जिनकी मौत या ग़ायब हो जाना आज तक अनुत्तरित प्रश्न है।यह संयोग हो सकता है।
यह सिस्टम का आत्म-संरक्षण भी हो सकता है। या फिर वह सच, जो कभी सार्वजनिक नहीं होगा।
धुरंधर का असली संदेश
धुरंधर यह नहीं कहती कि हर जवाब सरल है। यह यह भी दावा नहीं करती कि हर खलनायक मर चुका है।
यह सिर्फ़ इतना बताती है कि—
आतंकवाद सिर्फ़ पहाड़ों में नहीं छिपा होता, वह ग्लास टावरों, टैक्स हेवन, फ्री ज़ोन्स और लैपटॉप्स में भी पलता है।खनानी एक नाम नहीं है।वह एक मॉडल है।एक आर्थिक आतंकवादी ढांचा।और धुरंधर उस ढांचे को उजागर करने की एक सिनेमाई कोशिश है — यह पूरी तरह दस्तावेज़ है,कल्पना नहीं ।लेकिन पूरी तरह कल्पना भी नहीं।










