रायपुर:क्यों बना? कैसे बना? और विरोध के बाद भी आखिर किसके दबाव में बना? सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि वह ढांचा क्यों टूटा—सवाल यह है कि वह बना कैसे था?
और इससे भी बड़ा सवाल—बना ही क्यों था?
जिस समय यह निर्माण हो रहा था, तब भी जनता, स्थानीय लोग, शिक्षक, विद्यार्थी ,सदन से लेकर सड़क तक —सबने विरोध किया था। पर अधिकारियों की जिद बड़ी थी, अहंकार बड़ा था, और शायद लाभ उससे भी बड़ा रहा होगा ।विरोध को रौंदकर निर्माण कर दिया गया। क्यों? किसके आदेश पर? किसके हित में? इन सवालों के जवाब आज भी हवा में लटके हैं।
स्मार्ट सिटी का पैसा—शहर स्मार्ट हुआ या कुछ लोग स्मार्ट हो गए ? शहर को स्मार्ट बनाने के नाम पर आए करोड़ों रुपये… जिससे सड़कें सुधरनी थीं, बिजली व्यवस्था मजबूत होनी थी, खेल मैदान बनना था, बच्चों के लिए पार्क बनना था,
शहर को, जनता को राहत देनी थी।
उसी पैसे से शहर के दिल में एक नहीं अनेक ऐसा ढांचा खड़ा कर दिया गया जो अपने जन्म से ही विवादित था, गलत था, अनावश्यक था?
क्या स्मार्ट सिटी के नाम पर यह पैसा वाकई स्मार्ट उपयोग हुआ? या गलत को तोड़ना गलत है। या स्मार्ट तरीके से खर्च दिखाया गया? अगर जनता पूछे कि इस पैसे का हिसाब कहाँ है,
तो यह सवाल गलत कैसे हो गया?
शहर के मध्य सिर्फ स्कूल कॉलेज की जमीन बची है ऐसे जमीनों पर भी लोगों को गिद्ध नजर है ।शिक्षा के मंदिर में पूरा का पूरा बाजार
—क्या इससे बड़ा अपराध है?
जहाँ शांति होनी चाहिए, जहाँ किताबों की महक होनी चाहिए, जहां ज्ञान का प्रकाश फैलना चाहिए
वहाँ तले हुए व्यंजनों की खुशबू फैलती थी।
वहां अध्ययन के लिए आने जाने वाले , कक्षा में बैठे छात्र पढ़ाई नहीं, दुकानों के शोर और गंध से जूझते थे। बीडी सिक्ररेट गांजा की खुशबू से
क्या यह शहर की योजना थी?
क्या यह शिक्षा का सम्मान है?
क्या यह छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं? क्या यह अति नहीं है? कौन है जिम्मेदार इस शोर, गंध और अव्यवस्था के लिए
**10 करोड़ का खर्च—अब टूट गया
तो पैसे की लूट का अपराध किसके खिलाफ दर्ज होगा?** आज वह ढांचा टूट चुका है। पर सवाल यह है कि क्या टूटने के साथ अधिकारियों की जिम्मेदारी भी खत्म हो गई?
क्या यह इतना आसान है?
10 करोड़ रुपये हवा में उड़ जाएँ और कोई पूछने वाला न हो? क्या यह शासकीय धन की षड्यंत्रपूर्वक लूट नहीं? क्या यह अपराध नहीं?
क्या यह FIR लायक नहीं? अगर सरकारी धन गलत जगह, गलत फैसले और गलत उद्देश्यों में लगा—
तो जवाबदेही किसकी?
FIR क्यों नहीं? कार्रवाई कब?
स्मार्ट सिटी के नाम पर गलत निर्माण करने वालों पर अभी तक FIR क्यों नहीं? कार्रवाई क्यों नहीं?जाँच क्यों नहीं? वही लोग आज चुप क्यों हैं?
क्या प्रशासन का खजाना उनकी व्यक्तिगत जागीर है? जनता की जेब काटकर अधिकारियों का अहंकार पालना क्या क़ानूनी है?
ये प्रश्न जनता के हैं। और जनता को उत्तर चाहिए।उत्तर मिलना भी चाहिए। और अगर जवाब देने वाले नहीं हैं— तो इसका मतलब साफ है: कुछ छुपाया जा रहा है। जिम्मेदारी तय होनी ही चाहिए।
एक प्रश्न बार-बार लोगों के जिगर में आ रहा है कि इस चौपाटी में शहर के कितने बेरोजगारों को दुकान दी गई, शासन के पैसे से शासन के जमीन पर बनी दुकानों को किस रायपुर शहर के बेरोजगार युवा को आमंत्रित किया गया था? जिससे वे अपना घर चला सके ? जिससे बेरोजगार कर सके? जिससे उसकी रोजी रोटी चल सके? यह प्रश्न भी अनेक लोगों के मन में अ है क्या सरकारी जमीन सरकारी पैसे से बना हुआ यह प्रॉपर्टी सिर्फ बेचने के लिए था।
10 करोड़ का नुकसान सिर्फ पैसा नहीं—यह जनता के विश्वास की हत्या है।जिसने गलत बनाया,
जिसने गलत मंजूरी दी, जिसने विरोध के बावजूद इसे खड़ा होने दिया— सब पर कार्रवाई होनी चाहिए। यह मामला सिर्फ एक ढांचे का नहीं— यह जवाबदेही, पारदर्शिता और ईमानदारी का मामला है। अगर यह भी बिना कार्रवाई के खत्म हो गया,तो शहर में हर गलत निर्णय को “शासकीय निर्णय” कहकर वैध कर दिया जाएगा।










