रायपुर:खमतराई में चल रही श्रीमद् भागवत की कथा को पूर्णता प्रदान करते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द महाराज ने कहा कि गीता भगवान का हृदय है। भगवान श्री कृष्ण स्वयं अर्जुन से कहते हैं कि *गीता मे ह्रदयं पार्थ* अर्थात गीता भगवान का हृदय है।
जैसे दो मित्र परस्पर मित्रता करते हैं तो वे कहते हैं कि मैंने तुमको अपना हृदय दे दिया है वैसे ही भगवान ने अपना गीता रूप हृदय अर्जुन को दे दिया। भगवान गीता रुपी ह्रदय किसी को देना नहीं चाहते थे किंतु अर्जुन कुरुक्षेत्र में जब विषादग्रस्त हो गया तब उसे भगवान ने गीता रूप हृदय दे दिया इसलिए गीता के पहले अध्याय को विषाद योग कहा जाता है।
उन्होंने कहा अर्जुन भगवान के सामने रोने लगे कि मैं युद्ध नहीं करूंगा अंतर्यामी प्रभु आप मेरे हृदय की बात जान रहे हैं। जिनसे मैंने ज्ञान प्राप्त किया है, धनुष बाण चलाना सीखा है। तथा जिनकी उंगली पकड़कर के मैं बचपन में चला हूं, उन गुरु द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह पर कैसे शस्त्र चलाऊंगा? तथा राज्य जीतकर अंत में जिनके हाथों में राज्य सौपूगा ऐसे मेरे पुत्र पौत्रों पर कैसे शस्त्र प्रयोग करूं। जब अर्जुन की “किम् कर्तव्य विमूढ” की स्थिति बन गई, मोह ग्रस्त हो गया तब भगवान ने गीता का उपदेश दिया गीता का उपदेश जीवात्मा को मोह से मुक्त करने के लिए ही दिया जाता है तब भगवान ने गीता का उपदेश अर्जुन को निमित्त बनाकर दिया गीता की श्रोता एवं वक्ता परंपरा नहीं है श्रीमद् भागवत पारंपरिक ज्ञान है किंतु गीता सीधा भगवान का ज्ञान इसलिए इसको ब्रह्म विद्या कहा जाता है।
कथा के पूर्व यजमान सुदर्शन साहू पार्षद गज्जू साहू गोदावरी साहू मान बाई साहू निरंजन साहू मेनका साहू तथा परिवार के अन्य सदस्यों ने प्रातः काल से ही हवन तुलसी वर्षा कपिला तर्पण संपन्न किया तथा विशाल भंडार का आयोजन किया गया अंत में भागवत भगवान की पोथी का नगर भ्रमण भी कराया गया।











