रायपुर:खमतराई में चल रही श्रीमद् भागवत की दिव्य अमृतमयी कथा के बाल लीला प्रसंग को विस्तार देते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रमुख डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने कहा कि भगवान की लीला से प्रपंच का विस्मरण हो जाता है। भगवान की अनेक प्रकार की लीला होती हैं, कुछ लीलाएं ज्ञान की वृद्धि के लिए होती हैं, कुछ लीलाएं समाधि के लिए होती हैं, कुछ लीलाएं ज्ञान बढ़ाने के लिए होती हैं और कुछ लीलाएं रसास्वादन के लिए होती हैं। इन सब लीलाओं का एकमात्र यही उद्देश्य होता है कि मनुष्य को प्रपंच विस्मरण पूर्वक भगवान में भगवदासक्ति उत्पन्न करना तथा जीवन भगवन्मय बनाना ही है। इन लीलाओं को भगवान ने जगत के कल्याण के लिए प्रकट किया है और उनका वर्णन करके महापुरुषों ने संसार की पकड़ को ढीला कर भगवान की प्राप्ति का विशिष्ट आलंबन प्रदान किया है।
उन्होंने कहा यशोदा मैया का मन कभी कृष्ण में लगता है और कभी घर में फंसता है उनका मन चंचल है फिर भी वह घर के कार्य को इसलिए नहीं छोड़ती हैं क्योंकि लाला के लिए माखन मिश्री कौन तैयार करेगा? रोटी कौन बनाएगा? पलंग कौन बिछाएगा? आदि आदि। वास्तव में घर तो सब प्रकार से छोड़ देने योग्य है यदि वह नहीं छूटता है तो श्री कृष्ण के लिए समर्पित कर दीजिए घर के प्रत्येक कार्य का उद्देश्य श्री कृष्ण की उपासना होना चाहिए तो घर का कार्यकाज भी पूजा हो जाएगा।
भगवान श्री कृष्ण कभी दीवार पकड़ कर खड़े हो और गिरने लगे तो अपनी हाथ की परछाई पकड़ कर खड़े होने की कोशिश करें, कभी गोपिया पूछे तुम्हारी नाक कौन सी है? हाथ रखकर भगवान बताएं। दांत कहां? है उसे भी बताने के लिए मुस्कुरा देते थे। आंख कौन सी है? आंख टेढी करके देख लेते। दांत कहां है? उन्हें बताने के लिए मुस्कुरा देते थे। भगवान चोरी लीला का अभ्यास करने लगे। भगवान की चोरी लीला ध्यान करने के लिए है इसका आलंबन लेकर अपने मन को अंतर्मुख बनाया जा सकता है। जिससे भगवान बाहर भीतर सर्वत्र प्रकट हो जाएंगे। इस प्रकार से भगवान की लीलाओं का चिंतन मनन भक्तों के लिए सदा अभय प्रदान करने वाला होता है।
कथा के पूर्व यजमान सुदर्शन साहू, डुल्ली बाई साहू, गज्जू साहू, गोदावरी साहू, मान बाई साहू, निरंजन साहू, मेनका साहू तथा परिवार के अन्य श्रोताओं में भागवत भगवान की पोथी का पूजन कर पुराण पुरुषोत्तम भगवान की आरती की। शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वानों ने कर्मकांड भाग संपन्न कराया।

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