
रायपुर: प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था को लेकर हाईकोर्ट ने कार्यवाही के आदेश जारी कर दिए हैं। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा ने राज्य में बिना मान्यता के संचालित नर्सरी स्कूलों पर कार्यवाही के आदेश विकास तिवारी द्वारा दायर की गई जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान जारी किया गया। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव को निर्देश दिया है कि वर्ष 2013 से संचालित बिना मान्यता वाले सभी नर्सरी स्कूलों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई की जाए। जनहित याचिकाकर्ता विकास तिवारी ने कोर्ट को बताया कि छत्तीसगढ़ में तीन हजार से अधिक नर्सरी स्कूल बिना किसी मान्यता के चल रहे हैं, जहाँ न केवल अभिभावकों से मनमानी फीस वसूली जा रही है।
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट से 6 सप्ताह का समय मांगा है। इसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है। सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि वह नई शिक्षा नीति 2020, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राष्ट्रीय प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा नीति 2013 के अनुरूप निजी नर्सरी प्ले स्कूलों के लिए नियामक दिशा-निर्देश तैयार करने पर काम कर रही है।यह नीति 13 अगस्त 2025 को छत्तीसगढ़ के एक मामले में हाईकोर्ट के समक्ष पेश किया गया, जिसमें हाईकोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई थी कि 330 से अधिक नर्सरी स्कूल बिना मान्यता के चल रहे हैं।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि आरटीई एक्ट 2009 के तहत नर्सरी स्कूलों का पंजीकरण अनिवार्य नहीं है। गौरतलब है कि यह प्रगति अगस्त 2025 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस आदेश के बाद हुई है, जिसमें हाईकोर्ट ने सरकार की खिंचाई की थी, क्योंकि राज्य में 330 से अधिक नर्सरी स्कूल बिना मान्यता के संचालित हो रहे थे।
कांग्रेस नेता विकास तिवारी द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2013 से लागू नर्सरी स्कूलों की मान्यता संबंधी नियमों को नजरअंदाज कर नए नियम बनाकर पिछली तिथि से लागू नहीं किया जा सकता। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि जब 2013 से मान्यता की अनिवार्यता थी, तब 12 वर्षों तक बिना अनुमति स्कूल कैसे चलते रहे। चीफ जस्टिस ने कहा कि, आपने 25 जुलाई को कमेटी बनाई और दो दिन में रिपोर्ट भी आ गई। यह पूरी प्रक्रिया केवल बड़े स्कूल संचालकों को बचाने के लिए की गई है। कोर्ट ने तल्ख लहजे में कहा छत्तीसगढ़ एक विकासशील राज्य है, यहां शिक्षा विभाग के लापरवाह अधिकारियों के कारण गरीब बच्चों को उनके अधिकार नहीं मिल पा रहे हैं।









