
रायपुर: शंकराचार्य आश्रम बोरियाकला में चल रहे चातुर्मास प्रवचन मालाक्रम के क्रम को विस्तार देते श्रीमद्भागवत के प्रसंग में डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने बताया कि “सावधान न रहना ही मृत्यु है” सनत कुमारों ने उपदेश देते हुए बताया कि प्रमाद को ही मृत्यु कहते हैं प्रमाद असावधानी को कहते हैं।
जो असावधान रहता है वह ही मृत्यु के ग्रास में आता है। मंत्र में संदेह हो तो मंत्र नष्ट हो जाता है जप में चित्त व्यग्र हो तो जप नष्ट हो जाता है, जहां भगवान के भक्त न मिले वह स्थान नष्ट हो जाता है जिस श्राद्ध में शास्त्रीय विधि का प्रयोग न हो तो श्राद्ध नष्ट हो जाता है, जिस वंश में अनाचार आ जाता है वह वंश नष्ट हो जाता है इसलिए अपने गुरु पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए गुरु के वचनों में वेआस हो जाना चाहिए अपने अंदर दीनता की भावना लाना चाहिए मन के दोषों विजय प्राप्त करना चाहिए और भगवान की कथा सुनने में निश्चल मति होना चाहिए ऐसा करने से भागवत के श्रवण का व्यक्ति को पूरा-पूरा लाभ प्राप्त होता है। उन्होंने कहा यज्ञ, दान, तप, स्वाध्याय सबका यही फल है कि भगवान के चरणों में प्रेम हो, यदि भगवान के चरणों में प्रेम नहीं होता है तो पूजन, पाठ, यज्ञ, दान सभी असफल है। जीव को सदा सर्वदा सावधान रहना चाहिए मनुष्य का शरीर बार-बार प्राप्त नहीं होता है अतः साधना के द्वारा अनुष्ठान के द्वारा ज्ञान अथवा भक्ति के द्वारा अपने जीवन को इतना पवित्र और अनुकूल बना लेना चाहिए की मृत्यु का समय जब नजदीक आए तो भगवान नारायण की स्मृति स्वतः हृदय में आ जाए। अंत समय में नारायण की स्मृति ही जीवन की सफलता का मूल मंत्र है।
कथा के पूर्व यजमान मयंका अनिल पाण्डेय ने पोथी का पूजन किया तथा आरती की। शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वानों ने पूजन संपन्न कराई।








