रायपुर: शंकराचार्य आश्रम बोरियाकला में चल रही श्रीमद्भागवत की अमृतमयी कथा का विस्तार करते हुए डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने बताया कि अभिमान से विवेक शून्य हो जाता है।
उन्होंने कहा मनुष्य अभिमान के कारण ईश्वर परमेश्वर सबको भूल जाता है जिन श्री कृष्ण से अवतार ग्रहण की प्रार्थना करने के लिए अन्य देवताओं के साथ-साथ इंद्र भी क्षीर सागर के तट पर गए थे और गर्भ स्तुति करने मथुरा भी आए थे, उन्हीं श्री कृष्ण को अब यह इंद्र पहचान नहीं रहे हैं भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं पर फूल की वर्षा करते हैं, किंतु आज भगवान श्रीकृष्ण के लिए ही अपशब्दों का प्रयोग कर रहे। ब्रज की समस्त गाय ग्वाल वालों को नष्ट करने की बात कर रहा है। इस प्रकार अभिमान के वश में इंद्र के हृदय से देवत्व के स्थान पर असुरत्व का उदय हो रहा है।
भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को धारण कर लिया ग्वाल-वाल आपस में कहने लगे कन्हैया तो हमसे कुश्ती में हार जाता है हमको कंधे पर लेकर दौड़ता है यह इतनी देर तक पहाड़ उठा रखेगा इसका हाथ दुःखने लगेगा मित्र तुम थक गए हो थोड़ी देर के लिए यह पहाड़ श्रीदामा के हाथ में दे दो भगवान हंसने लगे और भगवान ने कहा कि आप सभी लोग अपनी लाठियां ले आओ और पहाड़ के नीचे लगा दो इस प्रकार सब मिलकर हम इस पहाड़ को उठाकर रखेंगे।
ग्वाल वाल प्रसन्न हो गए, सोचने लगे कि केवल कृष्ण ने ही इस पहाड़ को नहीं उठाया हम लोगों ने भी इसको धारण किया है केवल तुम्हारे उठाने से ये पहाड़ नहीं उठा है इस पर हमने भी लाठिया लगाई है। *प्रेम ऐसी वस्तु है कि इससे ऐश्वर्य पर दृष्टि नहीं* *जाती है* कितना भी ऐश्वर्य हो किंतु प्रेम उसको नीचे ही दबा देता है।कथा के पूर्व यजमानों ने पुराण पुरुषोत्तम भगवान की आरती की।









