
रायपुर: शंकराचार्य आश्रम बोरिया कला में चल रही चातुर्मास प्रवचन माला के क्रम को गति देते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने बताया कि भक्ति अंतःकरण की वासना को नष्ट कर देती है, तथा आत्मा में पड़े आवरण को भी धीरे-धीरे क्षीण कर देती है जिससे भजनीय का स्वरूप प्रकाशित हो जाता है। भक्ति महारानी माता के समान पोषण करती है और जीव के अंतःकरण के मल का प्रक्षालन भी करती है तथा परमात्मा से मिलवाने का काम भी करती है। माता के अनुग्रह के बिना कोई भी पुत्र अपने पिता को पहचान नहीं सकता है। पिता पुत्र के बीच में माता ही माध्यम होती है। अतः भक्त भगवान के बीच में भक्ति ही माध्यम होती है। भक्ति महारानी अन्तःकरण के शोधन के पश्चात भी जीव को परमात्मा से मिलवाने का कार्य करती है उक्त बातें नव योगीश्वर एवं निमि के संवाद में महाराज ने व्यक्त की। आगे निमि राजा ने पूछा कि भगवन् मुझे माया का लक्षण बताइए? क्योंकि माया कभी भक्त का स्पर्श नहीं करती है। उस माया का क्या स्वरूप है? मुझे आप लोगों की वाणी से तृप्ति प्राप्त होगी। तब अंतरिक्ष नाम के योगी ने बताया कि जो *नहीं है* और *दिखें* और जो *है* और न देखें उसे ही माया कहते हैं। माया सदसत् विलक्षण और अनिर्वचनीय होती है।
कथा के पूर्व श्री शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वानों ने पुराण पुरुषोत्तम भगवान की पोथी का पूजन कर आरती संपन्न की तथा जगत गुरुकुलम् के छात्रों ने मंत्र पाठ किया।










