
रायपुर:शंकराचार्य आश्रम बोरिया कला में चल रहे चातुर्मास प्रवचन माला के क्रम को गति देते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने बताया की अज्ञान से भय उत्पन्न होता है अपने स्वरूप का ज्ञान न होने के कारण ही व्यक्ति को भय उत्पन्न होता है वास्तव में भय कल्पित है हम सुखी हैं, हमारी मृत्यु होगी, हमारा जन्म होगा, यह सब अपने स्वरूप की स्मृति ना होने के कारण ही होता स्वरूप का ज्ञान होते ही व्यक्ति भय से मुक्त हो जाता है। *शरीर को मैं समझता है और संसार को मेरा समझता है तो* भय उत्पन्न हो जाता है।उन्होंने कहा यही भय हमारे विनाश का कारण बनता है इसी भय के कारण हमको बार-बार जन्म लेना पड़ता और मृत्यु की ग्रास में जाना पड़ता है, इस भय की मुक्ति के लिए भगवान की भक्ति अथवा उनकी शरण में जाना पड़ता है। *जिससे मैं और मेरेपन का भाव भी नष्ट हो जाता है। *मेरे* को भक्ति और *मैं* को ज्ञान नष्ट कर देता है। उक्ताशय का उपदेश राजा निमि विदेहराज की यज्ञ में उपस्थित नवयोगीश्वर महाराज दे रहे हैं।
आगे महाराज ने बताया कि भगवान की भक्ति सभी अनर्थों के मूल को नष्ट करने वाली है। *देह को ‘मैं’ मानने से ही मृत्यु का भय उत्पन्न होता है* अपने को जीव मानने से तथा अपने को आत्मा मानने से अपने को ब्रह्म मानने से मृत्यु का डर नहीं उत्पन्न होता है जब अपने को शरीर मानने से ही मृत्यु का भय उत्पन्न होता है।
कथा के पूर्व श्री शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वानों ने एवं जगतगुरुकुलम् के समस्त छात्रों ने मिलकर भागवत पोथी की आरती की तथा मंगलाचरण संपन्न किया।










